भारत में ग्रीक या रोमन साम्राज्य की प्रतीकात्मक ‘न्याय की देवी’ (आँखों पर पट्टी बंधी मूर्ति) के स्थान पर भारत की अपनी न्यायप्रिय और सत्यवादी रानी अहिल्याबाई होल्कर को ‘न्याय की देवी’ घोषित करने की मांग की जा रही है।
अहिल्याबाई का ज्ञान और न्याय : अहिल्याबाई अत्यंत सुशिक्षित थीं (80 ग्रंथों का अध्ययन किया था) और उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण कर लोगों की धार्मिक आस्था को करीब से देखा था। वे सुविवेक और अनुभव के आधार पर निष्पक्ष न्याय करती थीं।
महिला अधिकार और संवेदनशीलता : उन्होंने विधवा महिलाओं को पति की संपत्ति पर अधिकार और पुत्र गोद लेने (दत्तक) की अनुमति दी। भ्रष्ट अधिकारियों को सजा दी और पीड़ित महिलाओं को लोक कल्याणकारी कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
कठोर और निष्पक्ष फैसले : न्याय के मामले में वे इतनी सख्त थीं कि उन्होंने नियम तोड़ने पर अपने पति खंडेराव को भी आर्थिक दंड (25 मोहरें) दिया था। हालाँकि अपने पुत्र मालेराव को मृत्युदंड देने की लोककथाओं को इतिहासकार सर जॉन माल्कम ने सबूत न मिलने पर खारिज किया था।
त्वरित और मुफ्त न्याय : उनकी न्याय व्यवस्था मुफ्त, उचित और त्वरित थी। वे मानती थीं कि देर से मिला न्याय भी एक तरह का अन्याय है।
अंतिम मांग : लेखक डॉ. एन.जी. काले के अनुसार अहिल्याबाई को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए देश के हर न्यायालय में उनकी तस्वीर लगाई जानी चाहिए।
-डॉ. एनजी काले
पूर्व प्राध्यापक शा. होल्कर कॉलेज एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर (अहिल्या रत्न, मल्हार रत्न पुरस्कार प्राप्त), मो. 9131720494, 9827757858
अहिल्याबाई होल्कर को ‘न्याय की देवी’ घोषित किया जाए!
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