(मधुगीति 260822 B) 11:06
देखे कहाँ विराट विश्व,
सीमित दृग भव;
खग मृग के भाव समझे कहाँ,
आत्म प्रवाहित!
ना जान पाए निज स्वरूप,
ना ही मात पित;
जो आस पास रहे उनके,
ना ही चीन्हे चित!
भ्रम भ्रांत क्लांत रहे चलत,
बोधि बिन विधृत;
आयाम कितने झाँके नहीं,
तन मन तंद्रित!
खोलो किबाड़ उठो आओ,
देखो बाहर;
आत्मा का भुवन ताको,
जो है कितना मनोहर!
समझोगे सभी द्वैत दृश्य,
वो रहोगे ना तुम;
हर ‘मधु’ अंत: वाह्य जगत्,
देखोगे केशव!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
देखे कहाँ विराट विश्व!
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