उत्तर प्रदेश में गडरिया की उपजाति धनगर के संवैधानिक अधिकार और पहचान को लेकर समाज के अनेक जागरूक लोग लगातार अभियान चला रहे हैं। व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों को उनकी सही पहचान और अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा रहा है। फिर भी यदि किसी युवा को आज भी ‘पाल, बघेल, गड़ेरिया’ लिखने में ही गौरव महसूस होता है और ‘धनगर’ लिखने में संकोच या हीन भावना होती है, तो एक बार अपने माता-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी से जरूर पूछिए—हमारी वास्तविक जातीय पहचान क्या है? याद रखिए—अपनी पहचान जानना और उसे सम्मान के साथ लिखना शर्म की बात नहीं, स्वाभिमान की बात है। यदि आपकी पारिवारिक पहचान नीखर नहीं है, तो अपनी पहचान को समझिए और अपने पूर्वजों से सत्य जानिए। केवल सामाजिक दिखावे, अज्ञानता या दूसरों की नकल के कारण अपनी पहचान बदलना स्वाभिमान नहीं, अपनी जड़ों से दूरी है। धनगर होना कोई हीनता नहीं है। धनगर अपनी पहचान है, इतिहास है और स्वाभिमान है। अब समय है कि युवा भ्रम छोड़ें, अपनी जड़ों को जानें, सही जानकारी प्राप्त करें और अपनी वास्तविक पहचान को सम्मानपूर्वक लिखें और बोलें। पहचान छिपाने में नहीं, पहचान पर गर्व करने में स्वाभिमान है।
-गम्भीर धनगर, आगरा
मो. 9690470266
धनगर समाज के युवाओं से एक जरूरी अपील!
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