गोचरों का नेपथ्य पुस्तक की परिकल्पना आज से लगभग 3 वर्ष पूर्व डॉ. जेपी बघेल व शिवकुमार दीपक की वार्ता से ही साकार और संपन्न हो सकी है। इसके साथ ही जनवरी 2025 में अंतर्राष्ट्रीय मंच ‘अमरलेख’ के संस्थापक कवि रवि पाल ‘खामोश’ व रूपेश धनगर की अथक मेहनत और सहयोग से यह महाग्रंथ प्रकाशित होकर चरवाहा समाज के बीच उपलब्ध है। गोचरों के नेपथ्य शीर्षक पर भी संपादक मंडल ने सभी कवियों के बीच विचार मंथन किया। इसमें गोचरों का अर्थ गोचारण यानि चारागाह है। नेपथ्य का अर्थ पटल से है। गो का अर्थ भेड़, बकरी, गाय और भैंस आदि दुधारू पशुओं (चौपायों) से है। विश्व की हर सभ्यता के मूल गोपालक/भेड़पालक ही थे। गोपालक चरवाहे हर जाति और हरेक सभ्यता के आदि पुरुष हैं। आज के धनगर चरवाहे उसी मूल के वंशज हैं। इन धनगर चरवाहों का डीएनए आॅस्ट्रेलॉयड है जो कि आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के मूल निवासी थे। भेड़पालक समुदाय के प्रथम कवि कौन थे? भेड़पालक समुदाय के प्रथम लेखक कौन थे? भेड़पालक समुदाय ने गिनती कैसे सीखी? उन्होंने कौन-कौन सी लिपि खोजी? कितनी भाषाएं बनाईं? कितने आविष्कार किए? कितनी डगर (पथ) और न जाने कितने थान (पैतृक देवस्थान) आदि संरक्षित रखे? इन चरवाहों ने जड़ी-बूटी, खाद्य पदार्थ, जहरीली वस्तु आदि की खोजें कीं। लेकिन कुछ भी इन चरवाहों के नाम पर नहीं लिखा गया। ये चरवाहे आखिर लिखते कैसे? कलम इन चरवाहों के पास थी अथवा नहीं थी, यह भी शोध का विषय है। इन चरवाहों के पास थी लाठी और इसी लाठी के दम पर चरवाहे राजा और शासक बने और बनते आ रहे हैं। इस संकलन के सबसे पहले कवि का जन्म सन 1912 में हुआ। वह निरक्षर थे और साथ ही जन्मांध कवि थे। उनके साहित्य का प्रकाशन उनके शिष्य शिव भजन प्रसाद वैरागी ने कराया था। अन्यथा हम सभी चरवाहे उनके कृतित्व और जीवन वृत्तान्त से अनभिज्ञ ही रह जाते। हम उन्हें सबसे उम्रदराज यानि वरिष्ठ कवियों की श्रेणी में रखते हैं। स्व. दिलसुखराम ब्रह्मचारी एकमात्र ऐसे कवि हैं जो स्वतंत्रता सेनानी भी रहे थे। इस संकलन की सबसे छोटी कलम के सिपाही बंधुवर घनिष्ठ हैं जिनकी दो कृतियां हिंदी साहित्य व अंग्रेजी साहित्य (कविता संग्रह) प्रकाशित हो चुकी हैं। गोचरों के नेपथ्य के संपादक मंडल भी ब्रजभूमि से ताल्लुक रखते हैं इसमें कोई शंका नहीं है। डॉ. जेपी बघेल तत्कालीन मथुरा (वर्तमान हाथरस जनपद) की सादाबाद तहसील के सीस्ता नामक गांव से सम्बन्ध रखते हैं जो कि धनगर चरवाहा किसान परिवार में जन्मे थे। दूसरे संपादक शिवकुमार दीपक भी हाथरस जनपद के बहरदोई नामक गांव के निवासी हैं। तीसरे संपादक रवि पाल खामोश हैं जो कि इटावा में जन्मे हैं और पेशेवर सैनिक हैं। खामोश जी कलम और बंदूक दोनों के सिपाही हैं। चौथे संपादक रूपेश धनगर हैं जो कि एक धनगर चरवाहा किसान परिवार में एक छोटे से गांव नगला बाला में पैदा हुए। मुझे इस बात पर बेहद आश्चर्य होता है कि धनगर चरवाहा समाज की बहुत बड़ी आबादी (लगभग 15%) होने के बाद भी समूचे भारत में उत्तर भारत के हिंदी पट्टी के राज्य उत्तर प्रदेश के चार में से तीन संपादक लगभग एक ही जिले मथुरा से संबंध रखते हैं और उन्होंने गोचरों का नेपथ्य का संकलन करके सभी कवियों को अजर अमर कर दिया है। इस तरह का ऐतिहासिक कृतित्व पूरे चरवाहा समाज में अद्वितीय स्थान रखता है। यह देश में धनगर चरवाहा समाज की पहली लिखित ऐतिहासिक पुस्तक है। यह 580 पन्नों का ग्रन्थ चरवाहा समाज का प्रथम ऐतिहासिक और शोधपूर्ण दस्तावेज है। इस महाग्रंथ के चारों संपादक व प्रकाशक आदि सभी बधाई के पात्र हैं। गोचरों के नेपथ्य महाग्रंथ में कुल 16 कवयित्रियों का जीवन परिचय ज्ञात हो सका है। 1950 से 1960 तक एकमात्र कवियित्री श्रीमती रंजना फत्तेपुरकर हैं। 1960 से 1970 के दशक में कवयित्रियों की संख्या शून्य है। 1970 से 1980 के दशक तक कुल 6 कवयित्री हैं। 1980 से 1990 के दशक तक कुल 4 कवयित्री हंै। 1990 से 2000 के दशक तक 5 कवयित्री हैं। इसमें कोई भी कवयित्री आजादी से पहले की नहीं है बल्कि सभी स्वतंत्र और गणतंत्र भारत की कवयित्रियां हैं। गोचरों का नेपथ्य महाग्रंथ के अनुसार स्वतंत्र भारत की चरवाहा समाज की पहली कवयित्री श्रीमती रंजना फत्तेपुरकर हैं जिनका जन्म सन 1952 में हुआ है। धनगर चरवाहा समाज की दूसरी कवयित्री श्रीमती स्नेहलता नीर हैं। धनगर चरवाहा समाज में प्रथम पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाली कवयित्री डॉ. श्रीमती सुशीला पाल हैं। इसी क्रम में दूसरी पीएचडी डिग्री धारण करने वाली कवयित्री डॉ. शशि धनगर हैं एवं तृतीय क्रम पर पीचडी की डिग्री धारण करने वाली डॉ. संगीता पाल हैं। गोचरों का नेपथ्य की कवयित्रियां कुशल गृहिणी के साथ-साथ विभिन्न पदों को भी सुभोभित कर रही हैं। पुस्तक में कवियों को तीन भागों में बांटा गया हैं। प्रथम भाग में कुल 9 कवि हैं जिन्हें ‘विरासत के कवि’ नाम से प्रकाशित किया गया है। द्वितीय भाग में ‘वर्तमान युग के कवि’ नाम से कुल 104 कवियों को प्रकाशित किया गया है। तीसरे भाग में ‘परिशिष्ट के कवियों’ की कुल संख्या 50 है। परिशिष्ट के कवियों की रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से चुन-चुनकर संकलित की गई हैं। इस संकलन में मुख्य कवियों को विरासत के रूप में सन 1912 से 1944 तक के कालखंड के अनुसार जन्मे 9 कवियों की रचनाओं को प्रकाशित किया गया है। 1910-1920 के दशक में केवल एक कवि है। 1920-1930 के दशक में केवल 2 कवि हैं। 1930-1940 के दशक में छ: कवि हैं। 1940-1950 के दशक में सात कवि हैं। 1950-1960 के दशक में चौदह कवि हैं। 1960-1970 के दशक में सत्रह कवि हैं। 1970-1980 के दशक में बाईस कवि हैं। 1980-1990 के दशक में उन्नीस कवि हैं। 1990-2000 के दशक में बाईस कवि हैं। 2000-2010 के दशक में केवल तीन हैं। इसमें कुल मिलाकर 113 कवि सम्मिलित हैं। इसमें परिशिष्ट के कवि शामिल नहीं हैं। मैने समीक्षा की दृष्टि से परिशिष्ट के कवियों को राज्यवार आंकड़ों में शामिल किया है। अगर हम राज्यवार कवियों के आंकड़ों पर बात करें तो हमें उत्तर प्रदेश से सर्वाधिक एक सौ तीन, मध्य प्रदेश से सोलह, राजस्थान से नौ, बिहार से सात, हरियाणा से पांच, नई दिल्ली से पांच, महाराष्ट्र से चार, गुजरात से दो, उत्तराखंड से एक, कर्नाटक से एक और छत्तीसगढ़ से एक, इस तरह कुल ज्ञात 154 कवि हैं और 9 कवि ऐसे हैं जिनका स्थायी पता स्पष्ट तौर पर ज्ञात नहीं हो पा रहा है। इस तरह गोचरों का नेपथ्य 11 राज्यों के कुल 163 हिंदी कवियों को संकलित कर 580 पृष्ठ का महाग्रंथ बनकर आप सभी के बीच में पठन-पाठन और शोध हेतु उपलब्ध है। गोचरों का नेपथ्य के कवियों ने पद, भजन, गीत, कविता, मुक्तक, छंद, सवैया, ककहरा, कव्वाली, चदरी, घनाक्षरी, दोहे, कुंडलिया, हाइकु एवं अजल, सजल और गजल आदि विधाओं पर खूब कलम चलाई है। गोचरों का नेपथ्य ग्रंथ में संत, स्वतंत्रता सेनानी, संपादक, फोटोग्राफर, शिक्षक, प्रधानाचार्य, रेलवे अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी, कृषि अधिकारी, प्रबंधक, महानिदेशक, एडवोकेट, फार्मासिस्ट, चिकित्सक, पत्रकार, पुलिस, सैनिक और सिविल इंजिनियर, मैकेनिकल इंजीनियर, बैंक कर्मचारी आदि जैसे पेशों से जुड़े होने के बावजूद बहुत ही उम्दा कलम के सिपाही भी हैं। इन कवियों में निरक्षर, हाईस्कूल, बारहवीं के साथ-साथ बीए, एमए, एलएलबी और एमबीए व नेट, जेआरएफ, पीएचडी जैसी अर्हताओं का मानक पूरा करते है। साथ ही साथ इस संकलन में 22 कवि और कवयित्रियों के पास पीएचडी की डिग्री भी है जो कि उनके नाम के आगे शोभायमान हैं। पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्हें भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ सम्मान से सम्मानित किया गया है जो कि विरासत के कवि हैं। डॉ. हरिसिंह पाल सौरभ हिंदी पत्रिका न्यूयॉर्क अमेरिका से प्रकाशित होने वाली पत्रिका के प्रधान संपादक, नागरी लिपि परिषद (शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार से संबद्ध) के महामंत्री, नागरी संगम शोध पत्रिका के प्रधान सम्पादक, विश्व नागरी विज्ञान संस्थान गुरुग्राम के महानिदेशक हैं। वे हिन्दी सलाहकार समिति संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के पूर्व सदस्य भी रहे हैं। डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’ अखिल विश्व हिंदी समिति टोरंटो कनाडा के अध्यक्ष हैं। डॉ. राजेंद्र मिलन आॅथर्स गिल्ड आॅफ इंडिया के सम्मानित सदस्य हैं। वे हिंदी सलाहकार समिति भारत सरकार के सदस्य भी हैं। डॉ. जेपी बघेल इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस (भारत के इतिहासकारों की प्रतिनिधि संस्था) के आजीवन सदस्य हैं। वे आशीर्वाद साहित्यिक सामाजिक व सांस्कृतिक संस्था मुंबई के महासचिव भी हैं। डॉ. बी.एस. पाल रूसी एव फ्रेंच भाषा में डिप्लोमाधारी कवि हैं। प्रेम कुमार पाल सत्यचक्र साप्ताहिक पत्रिका के संपादक हैं। संजय शेफर्ड घुमक्कड़ी की त्रैमासिक पत्रिका स्ट्रोलिंग इंडिया का संपादन कर रहे हैं। डॉ. यशोयश देवनागरी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था एवं देवनागरी प्रकाशन के संस्थापक व अध्यक्ष हैं। शिवकुमार दीपक दोहा कुंडलियां छन्द की समर्पित पत्रिका दोहा दर्पण के संपादक हैं। वे साहित्य रत्न ई-पत्रिका के अतिथि संपादक भी रह चुके हैं। वर्ष 2003 से उनकी रचनाएं मैथिली विश्व विद्यापीठ दरभंगा बिहार, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ भागलपुर बिहार के परास्नातक पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं। डॉ. श्रीमती सुशीला पाल गुजराती बोल पत्रिका की संपादक रही हैं। वे बड़ोदरा के वी.एन.एम. न्यूज चैनल में संपादक और प्रूफ रीडर रही हैं। डॉ. शशि धनगर शशिराज एजुकेशन एंड हेल्थ फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं। रवि पाल खामोश अमरलेख अंतर्राष्ट्रीय मंच इटावा के संस्थापक हैं। श्रीमती सरोज सौदामिनी अमोघ वार्षिक साहित्यिक पत्रिका की सह संपादक हैं। गोचरों के नेपथ्य में दो कवि ऐसे भी हैं जिन्होंने विश्व कल्याण के लिए अपनी देह दान करने का साहसिक और जनकल्याणकारी कार्य करने का फैसला लिया है। 1910 से 2026 तक 116 वर्षों की कालावधि में लगभग विरासत के कवियों के नौ कवियों के साथ और 104 प्रतिनिधि कवियों और पचास परिशिष्ट के कवियों सहित कुल 163 कवियों के जीवन परिचय और उनके साहित्य से समाज का परिचय कराया गया है। गोचरों का नेपथ्य के कवि अपने नाम के पीछे गोत्रनाम या जातिनाम अथवा साहित्यिक उपनामों को भी लिखते हैं और लिख रहे हैं। एक उदाहरण के तौर पर दो कवि ऐसे हैं जो अपने नाम के अलावा दूसरा कोई टाइटल ही नहीं लिखते हैं जिसमें एक महिला कवयित्री हैं और एक पुरुष कवि हैं। साधिकार शेफर्ड लिखने वाले केवल एक कवि संजय शेफर्ड हैं। राईका उपनाम लिखने वाले केवल एक कवि हैं। पाली उपनाम लिखने वाले केवल एक कवि हैं। आर्य उपनाम लिखने वाले केवल एक कवि हैं। वर्मा उपनाम लिखने वाले केवल दो कवि हैं। होलकर उपनाम लिखने वाले केवल दो कवि हैं। गडरिया उपनाम लिखने वाले केवल दो कवि हैं। देवासी उपनाम लिखने वाले केवल दो कवि हैं। रबारी उपनाम लिखने वाले केवल तीन कवि हैं। अपने नाम के पीछे गोत्र लिखने वाले मात्र आठ कवि हैं। धनगर उपनाम लिखने वाले 15 कवि हैं। बघेल उपनाम लिखने वाले केवल 26 कवि हैं। पाल उपनाम लिखने वाले केवल 59 कवि हैं। साहित्यिक उपनाम लिखने वाले 40 कवि हैं। गोचरों का नेपथ्य के कवि पुष्प, शशि, मिलन, दयालु, विषधर, मधु, पथिक , प्रयागी, पीयूष, राजन, बेताब, नीर, परिवर्तन, इंदु, दीपक, बृजवासी, अश्क, श्याम, माही, राज, शोहरत, जौनपुरी, रत्न, आशु, खामोश, विमल, अमर, पद्म, मुसाफिर, शेष, अवधवासी, माहिर, टाइगर, सौदामिनी, ओजल, वैशाली, माखन, ऊन, उत्तम, किसलय आदि साहित्यिक उपनामों को लिखते रहे हैं। इस ग्रन्थ के लोकार्पण समारोह में सम्मिलित न होने का मुझे जीवनभर खेद रहेगा। क्योंकि मैं उस दिन का और उस ऐतिहासिक राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का प्रत्यक्षदर्शी न बन पाया। मैं चरवाहा समाज से आशा करता हूं कि निकट भविष्य में चरवाहा समाज के विद्वान लोग इस ग्रन्थ से प्रेरणा लेकर इससे भी बेहतर ऐतिहासिक, शोधपूर्ण ग्रंथों का प्रकाशन करेंगे। मैं आशा ही नहीं बल्कि अच्छे और अनुभवी वरिष्ठ साहित्यकारों से नम्र अनुरोध करना चाहूंगा कि हमारे स्वतंत्रता सेनानी, संत और सैनिक जैसी महान विभूतियों पर भी शोधपूर्ण ग्रन्थ आगामी कुछ वर्षों में प्रकाशित होने चाहिए। मैं संपादक मंडल और प्रकाशक विद्वानों को चरवाहा समाज के प्रथम राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन करने के लिए भी बधाई देता हूँ। संपादक मंडल व प्रकाशक समूह और समाजसेवी एवं सहयोगियों और इस ग्रन्थ के समस्त कवि और कवयित्री आदि सभी बधाई के पात्र हैं।
-अजीत सिंह धनगर
कवि/लेखक, हाथरस
मो. 7455949074, 6395425492
गोचरों का नेपथ्य : एक समीक्षात्मक मूल्यांकन
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