आज इस निर्णायक समय में लोकतंत्र में विपक्ष सभी तरीके से क्या साथ है? क्षेत्रीय दल जैसे सपा की भूमिका संदिग्ध है। अगर लोकतंत्र बचाने का नारा, व्यवस्था बदलने का नारा, बेरोजगारी, चुनाव आयोग या अन्य सरकारी निकाय ठीक से काम करें, एक-दूसरे से मैनेज न हों तो विपक्ष को सही ढंग से अपनी एकता प्रदर्शित करनी पड़ेगी। अपने-अपने नफा-नुकसान भूलकर जनता की आंकांक्षाओं पर खरा उतरना पड़ेगा, जो शायद मुझे नहीं दिखाई दे रहा है। आधे-अधूरे मन से सरकार का विरोध अच्छे परिणाम नहीं देगा। सब अपने-अपने मीडिया सेल में नियुक्ति कर रहे हैं। स्लोगन पॉलिटिक्स कहाँ ले जाएगी अपने देश भारत के लोकतंत्र को; अब विचारणीय सवाल बनता जा रहा है। सरकार की हठधर्मिता सारे नैतिक मानदंड तोड़ रही है। इसका कारण यह है कि विपक्ष भी अपने नफा-नुकसान में पड़कर लोकतान्त्रिक मूल्यों को कमजोर कर रहा है। लेकिन आशा से ही सब कुछ है। दुनिया उसी पर कायम है। वोटर भी कहाँ जायेगा? वह भी पक्ष-विपक्ष के सही गलत में अपने भविष्य को कैसे सुरक्षित रखेगा, देख रहा है? परिणाम भविष्य के गर्भ मे है। वैसे तो स्लोगन में विकसित भारत तो मल्टीमीडिया में दिखाई ही दे रहा है और वह सभी राजनैतिक दल करने की फिराक में हैं। देखिए, अब आगे-आगे होता है क्या?
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822
विपक्ष को सही ढंग से अपनी एकता प्रदर्शित करनी पड़ेगी!
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