कलम चलाऊँ तो क्या लिखूँ?
मुल्क की बर्बादी
या खाकी द्वारा नंगी पीठ पर लिखी वो लिपि
जिसे पढ़ने के लिए किसी गाँधी को पुन:
हाड़-मांस की काया में जन्म लेना पड़ेगा।
घुप अँधकार
आँखों में भविष्य का डर
आज के हर युवा का यही तो दर्द है
सत्तारूढ़ भेड़ियों का क्या
वे तो कल भी मजे में थे
आज भी मजे में हैं
और आने वाले कल में भी मजे में ही रहेंगे।
हमारे हिस्से में चीखें हैं
भूख है, बेरोजगारी है, लाचारी है।
आज जब मशाल युवाओं ने जलाई है तो,
माननीयों को दर्द हो रहा है
ये लाखों सैनिक तुम्हारे हैं
तुम्हारे एक इशारे पर हमारी देह को
गिद्ध बन नोच खायेंगे
कुछ हद तक तो खा भी चुके
और तुम साधु बन रहे हो
अब अधिक ढोंग न करो
तुम अघोरी हो
हमारा शव तुम्हारे नाम
तुमको किसकी प्रतीक्षा है?
-मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
गॉव-रिहावली, डाक-तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा-283111
मो. 9627912535
क्या लिखूँ?
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