हैदराबाद। यह कहानी है महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के कागल तालुका के यम्मा गाँव के रहने वाले बिरदेव सिद्धप्पा की। इनके माता-पिता गंगव्वा और सिद्धप्पा जीवनभर भेड़-बकरी चराने का कार्य करते थे। परिवार के पास मात्र पाँच एकड़ बंजर भूमि थी। अत्यंत निर्धनता के कारण बिरदेव का बचपन भेड़ों के साथ पहाड़ों में बीता। इसी कारण गाँव वाले इन्हें ‘गड़रियों का रखवाला साहब’ कहकर पुकारते थे। इनका प्रेरणादायी संदेश जोकि इन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा था-‘जीवन में कभी विमान को निकट से देखा है? मैं तो विमान की बात क्या करूँ, बस में बैठना भी मेरे लिए कठिन था। आज मेरे साथ मेरे माता-पिता पहली बार विमान में बैठे हैं। आकाश में उड़ने के लिए हमें पंखों की आवश्यकता नहीं, आत्मविश्वास, धैर्य और सही लक्ष्य की आवश्यकता है। यदि ये हमारे भीतर हैं, तो हमें अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए।’
संघर्ष से सफलता तक की यात्रा
प्रारंभिक शिक्षा गाँव के सरकारी विद्यालय में हुई। निर्धनता के कारण इन्होंने छात्रावास में रहकर अध्ययन किया और कोल्हापुर में डाकिया का कार्य भी किया। इन्होंने इंजीनियरिंग की शिक्षा पूर्ण की और उसके पश्चात संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी आरंभ की। प्रथम प्रयास में असफल रहे। द्वितीय प्रयास में मात्र 30 अंकों से चूक गए। दिल्ली में रहकर मजदूरी तक करनी पड़ी। कई बार निराश होकर पुन: माता के साथ पशु चराने चले जाते थे। वर्ष 2023 में इन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में 551वाँ स्थान प्राप्त किया। वर्ष 2024 में इनका चयन भारतीय पुलिस सेवा के लिए हुआ। वर्तमान में ये हैदराबाद स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
सबसे भावुक क्षण
प्रशिक्षण के पश्चात जब इन्हें प्रथम वेतन प्राप्त हुआ, तो इन्होंने अपने माता-पिता को जीवन में पहली बार हवाई जहाज में बैठाकर यात्रा करवाई। वही चित्र आज पूरे देश में प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह सत्य है कि लक्ष्य दृढ़ हो तो भेड़ चराने वाला भी देश का आईपीएस अधिकारी बन सकता है। -रवि कुमार बघेल
भेड़-बकरी चराने वाला बिरदेव बना आईपीएस
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