आदिकाल से ही गड़रिया, धनगर, पाल और बघेल समाज की आजीविका का मुख्य आधार पशुपालन रहा है। भेड़, बकरी, गाय और भैंस के झुंड में एक प्राणी ऐसा होता था, जिसे आधा झुंड माना जाता था, वह है मेढ़ा, जिसे हमारी स्थानीय बोली में ‘राम’ भी कहा जाता है। झुंड में मेढ़ा की भूमिका केवल एक नर पशु की नहीं, बल्कि एक कुशल नेता और रक्षक की होती है। जैविक और आनुवंशिकी की दृष्टि से झुंड की अगली पीढ़ी की गुणवत्ता, मेमनों का स्वास्थ्य और नस्ल का विकास पूरी तरह मेढ़ा पर निर्भर करता है। वही सबसे बलशाली होता है और बाहरी शिकारी जानवरों के सामने सबसे पहले आक्रामक होकर खड़ा होता है। इसीलिए मादा भेड़ें सुरक्षा के लिए सदैव मेढ़ा के निकट रहती हैं। हमारा समाज केवल चरवाहा नहीं रहा है। इतिहास साक्षी है कि हम मेढ़ा की तरह ही क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले रहे हैं। झुंड की रक्षा, नेतृत्व और अनुशासन का जो गुण मेढ़ा में है, वही गुण गड़रिया-धनगर समाज में भी है। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर इसका जीता-जागता प्रमाण हैं कि कैसे एक चरवाहा समाज ने शासन और न्याय की मिसाल कायम की। हम मेढ़ा के मालिक ही नहीं, उसके मर्म को समझने वाले हैं। जैसे मेढ़ा अपने झुंड का नेतृत्व करता है, वैसे ही हमारा समाज भी आज समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने में एक मजबूत खंभा है। मेढ़ा हमारे लिए केवल पशुधन नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, स्वाभिमान और सामूहिक नेतृत्व का जीवंत प्रतीक है।
-धनगर गंगा विष्णु चन्देल
तहसीलदार, दिल्ली सरकार
मो. 9899641263
मेढ़ा : केवल पशु नहीं, गड़रिया-धनगर, पाल, बघेल समाज के नेतृत्व का प्रतीक!
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