
किसी सार्वजनिक स्थल पर पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के साथ स्व. मुलायम सिंह यादव का चित्र लगाए जाने पर पाल समाज द्वारा प्रश्न उठाना स्वाभाविक है। वह भी तब, जब सपा के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल स्वयं उस स्थल पर अग्रिम पंक्ति में उपस्थित हों। यह किसी राजनेता के प्रति अनादर का प्रश्न नहीं, बल्कि इतिहास, शासन-दृष्टि, लोक-कल्याण, महिला सशक्तिकरण, अर्थव्यवस्था, कृषि, समतामूलक सामाजिक और धार्मिक विकास के संदर्भ में लोकमाता देवी अहिल्याबाई के वास्तविक जमीनी प्रयासों को ओछी राजनीति के चक्कर में भूलने का है। प्रश्न लोकमाता देवी अहिल्याबाई जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व के सम्मान का ही नहीं, बल्कि उनके योगदान की गरिमा का भी है। लोकतंत्र में सभी जनप्रतिनिधियों का सम्मान हो सकता है, लेकिन सम्मान का अर्थ यह नहीं कि अलग-अलग ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के योगदान को बिना किसी भेद के समान धरातल पर प्रस्तुत कर दिया जाए। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर अठारहवीं शताब्दी की ऐसी शासिका थीं, जिन्होंने व्यक्तिगत जीवन में असहनीय दुखों, राजनीतिक विरोध और सत्ता संबंधी चुनौतियों के बीच एक राज्य का उत्तरदायित्व सँभाला था। उनकी महानता इस बात में थी कि निजी शोक को उन्होंने सार्वजनिक दायित्व के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने सत्ता को व्यक्तिगत वैभव का साधन बनाने के बजाय जनकल्याण का माध्यम बनाने का आदर्श प्रस्तुत किया। उनके योगदान को केवल मंदिर निर्माण से समझना अधूरा होगा। सड़कों, घाटों, जलस्रोतों और धर्मशालाओं जैसी सुविधाओं से विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले यात्रियों और आम लोगों को भी लाभ मिलता था। उनके शासन की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा में धार्मिक आस्था के साथ न्याय, प्रशासनिक स्थिरता और लोकहित का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। उनके प्रशासन में जन-सुलभ न्याय, किसानों की आजीविका, व्यापार की सुरक्षा और यात्रियों की सुविधाओं जैसे कार्य ऐसे आदर्श प्रस्तुत करते हैं, जो आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था में किसानों की क्षमता के अनुरूप राजस्व व्यवस्था, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और सार्वजनिक निर्माण पर ध्यान देना उनके प्रशासन की महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं। माहेश्वर में शिल्प, वस्त्र-निर्माण और व्यापार को बढ़ावा देने से उनकी आर्थिक दृष्टि भी स्पष्ट होती है। इस प्रकार उनका लोक-कल्याण केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था; वह आजीविका, आवागमन, आर्थिक गतिविधियों और सार्वजनिक सुविधाओं से भी जुड़ा हुआ था। उनके राजनैतिक दर्शन की सीमा केवल धार्मिक स्थलों का निर्माण नहीं, बल्कि न्याय, कर्तव्य, करुणा और जन-कल्याण को शासन के केंद्र में रखना भी था। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर की विरासत का मूल्यांकन जाति या समुदाय के राजनीतिक समर्थन से आगे बढ़कर किया जाना चाहिए। किसी शासक की वास्तविक कसौटी यह है कि वह अपने राज्य में न्याय, सुरक्षा, आजीविका और सार्वजनिक हित के लिए क्या करता है। अहिल्याबाई की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा इसी व्यापक प्रशासनिक और लोककल्याणकारी योगदान से जुड़ी हुई है। लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के शासन में आम जनता बेहद खुश थी और उन्हें देवी की तरह पूजती थी। लोकमाता को लाखों-करोड़ों लोग केवल एक ऐतिहासिक शासिका के रूप में नहीं, बल्कि न्याय, सेवा, त्याग और प्रजातांत्रिक नेतृत्व के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनकी स्मृति मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं, लोक-परंपराओं और जनश्रद्धा में सदैव जीवित है। लोकमाता को उनके जीवन में जनता द्वारा जो मान-सम्मान प्राप्त हुआ, वह किसी एक राजनीतिक दल या चुनावी समीकरण तक सीमित नहीं किया जा सकता है। वे राष्ट्र की एक अद्वितीय धरोहर हैं। लोकमाता का जीवन यह संदेश देता है कि नेतृत्व की वास्तविक प्रतिष्ठा सत्ता के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में छोड़े गए सकारात्मक परिवर्तन से निर्मित होती है। कठिन परिस्थितियों में राज्य को सँभालना, न्याय और प्रशासन को महत्व देना उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर का व्यक्तित्व किसी एक राज्य या राजनीतिक धारा तक सीमित नहीं है। उनका जीवन न्यायपूर्ण शासन, जनकल्याण, धार्मिक आस्था, सार्वजनिक निर्माण और कठिन परिस्थितियों में उत्तरदायित्व निभाने की प्रेरणा देता है। इसलिए लोकमाता देवी अहिल्याबाई का सम्मान करते समय उनके ऐतिहासिक योगदान की विशिष्टता, अतुलनीयता और सर्वोच्चता को दरकिनार करते हुए किसी राजनेता के साथ प्रस्तुत करना एक बेहद संजीदा भूल कहलाएगी। इसलिए लोकमाता देवी अहिल्याबाई के साथ किसी भी आधुनिक राजनीतिक व्यक्ति की फोटो लगाने से पहले ऐतिहासिक परिस्थितियों, जनता को प्राप्त अधिकारों की प्रकृति, शासन की जिम्मेदारियों और जनता के प्रति उनके समर्पण इत्यादि के संदर्भ में विवेकशील चिंतन अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। सनद रहे, आधुनिक राजनेताओं के सामाजिक और राजनीतिक योगदानों के साथ शासन काल की आलोचनाओं, विवादों और निर्णयों की भी समीक्षा होती है। यह प्रत्येक पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को सदैव स्मरण रखना चाहिए। लोकतंत्र में सम्मान सबका होता है, होना भी चाहिए। लेकिन इतिहास में स्थान योगदान, कृतित्व और विरासत के आधार पर निर्धारित होता है। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की गरिमा का सम्मान करने का सबसे सार्थक तरीका उनके त्यागपूर्ण जीवटता, न्यायप्रिय, लोककल्याणकारी और उत्तरदायी शासन के आदर्शों को समझना और सम्पूर्ण (व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक) जीवन में उन्हें धारण करना है। सनद रहे, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का सम्मान करना अच्छी बात है, लेकिन सर्वप्रिय न्याय की देवी के रूप में विश्व-प्रसिद्ध पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर जैसे अद्वितीय ऐतिहासिक व्यक्तित्व के प्रति विवेकपूर्ण ऐतिहासिक समझ सहित समुचित न्यायपूर्ण व्यवहार और यथोचित श्रद्धा अधिक जरूरी है।
-डॉ. विनोद पाल
सहायक प्रोफेसर, शिक्षा संकाय, यूपी कॉलेज, वाराणसी
(लेखक स्वतंत्र सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं।)
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