मेरे एक भाई ने कहा, ‘भंडारे में अपना आदमी नहीं रहेगा तो अपनी थाली में अच्छी-अच्छी चीजें, बड़ा लड्डू कौन डालेगा?’ भाईजी बेईमान को ही भंडारे में सर्विस देने वाले वेटर बनाना चाहते हैं। भाईजी मैंने पढ़ा है : अयं निज परोवेति, गणना लघु चेतसाम! ये अपना वो पराया, ऐसी सोच निम्न आचरण वालों में पाई जाती है। पक्षपाती लोगों को निम्न आचरण वाला समझा जाना चाहिए। क्या ‘वसुधैव कुटुंबकम’ सिर्फ कहने-सुनने के लिए है? इसे आचरण में उतारने की शिक्षा हम अपने बच्चों को नहीं देना चाहेंगे? धनगरों, मेरे भाइयों, मेरे मित्रों! उच्च आचरण अख्तियार करो! श्रेष्ठ मानव बनो! वैश्वीकरण का युग है। निम्न आचरण वाले कहीं टिक नहीं पायेंगे। मन, कर्म और वचन से :- झूठ नहीं बोलना है। चोरी नहीं करना है। हिंसा नहीं करना है। नशापान नहीं करना है। यौन कदाचार नहीं करना है। जुआ नहीं खेलना है। छल-प्रपंच नहीं करना है। धोखा-फरेब नहीं करना है। सम्मानहीन आजीविका नहीं चुनना है। सबसे प्रेम करना है। सबको सम्मान देना है। ऊंच-नीच, भेदभाव, पक्षपात से दूर रहना है। दुष्टों से भी दूर रहना है। इन बातों को आपने आचरण में लाने वाला धनगर श्रेष्ठ मानव है, ब्राह्मण है। तो आइए, हम धनगरों का सभ्य समाज, श्रेष्ठ समाज बनाने में योगदान करें!
-हीरालाल राऊत, नागपुर
मो. 9960600712
श्रेष्ठ समाज बनाने में योगदान करें!
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