देश की राजनीति में एससी, एसटी और ओबीसी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस विषय पर केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के आधार पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। राजनीतिक आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था की समयबद्ध समीक्षा और आवश्यक संवैधानिक सुधार होना चाहिए। यदि किसी व्यवस्था का उद्देश्य सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, तो यह भी देखना जरूरी है कि वह अपने मूल उद्देश्य को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा कर रही है। इसी संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी से स्पष्ट मांग है कि आगामी चुनाव से पहले एससी, एसटी और ओबीसी के राजनीतिक आरक्षण के विषय पर अपना रुख स्पष्ट करे तथा यदि आवश्यक हो तो उचित संवैधानिक संशोधन अथवा वैकल्पिक व्यवस्था पर देश के सामने ठोस प्रस्ताव रखे। यदि चुनाव से पहले भाजपा इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट नीति, उचित संशोधन या ठोस पहल नहीं करती है, तो एससी, एसटी और ओबीसी समाज के लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय भाजपा के रुख को ध्यान में रखें और लोकतांत्रिक तरीके से अपना निर्णय लें। यह किसी व्यक्ति या दल के प्रति व्यक्तिगत विरोध नहीं है। यह प्रतिनिधित्व, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की दिशा पर सवाल है। लोकतंत्र में वोट केवल सरकार बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों को उनकी नीतियों और निर्णयों के प्रति जवाबदेह बनाने का सबसे बड़ा साधन भी है। अब समय है कि एससी, एसटी और ओबीसी समाज राजनीतिक दलों से सवाल पूछे—हमारे प्रतिनिधित्व को लेकर आपकी नीति क्या है? या प्रतिनिधित्व के नाम पर पार्टी हितैषी एससी, एसटी और ओबीसी गुलामों को तैयार करना है। आपकी राजनीतिक आरक्षण की समयसीमा क्या है? हमारे सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों को लेकर आपका स्पष्ट रोडमैप क्या है? या राजनीतिक आरक्षण के नाम पर प्रतिनिधित्व के नाम पर धनाढ्य एससी, एसटी और ओबीसी को ही आगे लाना है। सवाल पूछिए, नीतियां देखिए, तथ्यों को समझिए और फिर अपने मताधिकार का स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक तरीके से प्रयोग कीजिए।
-उदय पाल, दिल्ली
मो. 9821189131
राजनीतिक आरक्षण पर अब निर्णायक बहस जरूरी है!
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