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सत्ता के शिखर पर संगठन का ‘झुनझुना’ और हाशिये पर खड़ा गड़रिया समाज!

उत्तर प्रदेश की सियासत में जब-जब बदलाव की बयार बही, तब-तब जातिगत समीकरणों की बिसात पर नए मोहरे सजाए गए। कांग्रेस के अवसान के बाद सूबे की राजनीति जिस मंडल और कमंडल के दौर में दाखिल हुई, वहां सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता की मलाई चंद रसूखदार और मुखर जातियों तक ही सिमटकर रह गई। मुलायम सिंह यादव ने पिछड़ों की लामबंदी कर सत्ता की इमारत खड़ी की, तो मायावती ने दलित अस्मिता, विशेषकर जाटव समाज के सहारे ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सफल प्रयोग किया। वर्तमान में राष्ट्रवाद, अंत्योदय और ‘सबका साथ-सबका विकास’ का दम भरने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का एकछत्र परचम लहरा रहा है। लेकिन इस समूचे राजनीतिक चक्रव्यूह में एक बुनियादी सवाल आज भी अनुत्तरित है—संख्या बल और सांगठनिक वफादारी में मजबूत होने के बावजूद गड़रिया (पाल/धनगर) समाज को वास्तविक राजनैतिक हिस्सेदारी मिली या उसे सिर्फ एक चुनावी मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया? यह एक ऐतिहासिक और सांख्यिकीय तथ्य है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के शासन काल में इस समाज को न केवल विधायकों की संख्या के लिहाज से, बल्कि सत्ता के गलियारों में सम्मान के स्तर पर भी सबसे ज्यादा तवज्जो मिली। इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी और भाजपा ने इस विशाल और मूक वोट बैंक को साधने के लिए हमेशा प्रतीकात्मक नियुक्तियों और केवल चुनावी आश्वासनों का सहारा अधिक लिया। इसका सबसे बड़ा और जीता-जागता प्रमाण ‘धनगर आरक्षण’ का संवेदनशील मुद्दा है। अखिलेश यादव की सरकार ने अपने पूरे पांच साल के कार्यकाल में इस संवैधानिक मांग को प्रशासनिक पेचीदगियों और फाइलों के मकड़जाल में उलझाए रखा, जिसे समाज आज भी एक राजनीतिक ‘लॉलीपॉप’ की तरह देखता है। वहीं, वर्तमान भाजपा सरकार, जो खुद को सर्वसमावेशी और हर वर्ग की हितैषी कहती है, वह भी सत्ता के शीर्ष पर बैठकर इस आरक्षण के मुद्दे पर पूरी तरह मौन और उदासीन बनी हुई है। नतीजा यह है कि वर्तमान व्यवस्था में गड़रिया समाज खुद को वैचारिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह असहज और उपेक्षित महसूस कर रहा है। हालिया दिनों में उत्तर प्रदेश की सांगठनिक राजनीति में एक बेहद शातिर और सोची-समझी परिपाटी शुरू हुई है। प्रमुख राजनीतिक दलों में अचानक पाल समाज के चेहरों को संगठन के शीर्ष पदों पर बैठाने की एक छद्म होड़ सी मच गई है : अपना दल ‘सोनेलाल’ ने ‘राजकुमार पाल’ को प्रदेश का मुखिया बनाया था। बसपा ने ‘विश्वनाथ पाल’ को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। समाजवादी पार्टी ने ऐन लोकसभा चुनाव के मुहाने पर ‘श्यामलाल पाल’ को संगठन की बागडोर दे दी। इस चौतरफा घेराबंदी से घबराई भाजपा ने भी तात्कालिक डैमेज कंट्रोल के तहत पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष/तत्कालीन क्षेत्रीय अध्यक्ष प्रकाश पाल को ‘भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष’ घोषित कर पाल समाज के वोटों को बांधने का दांव खेल दिया। इतना ही नहीं, हाल ही में दिल्ली भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष संतोष पाल को बनाकर संगठन को दिल्ली से यूपी तक मजबूत करने और समाज को साधने की कवायद तेज कर दी गई है। पहली नजर में यह समाज के बढ़ते राजनैतिक रसूख का भ्रम पैदा कर सकता है, लेकिन सामाजिक और जमीनी दृष्टिकोण से विश्लेषण करने पर एक कड़वी और भयावह सच्चाई सामने आती है। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या ये तमाम सांगठनिक मुखिया अपने समाज के योग्य और कर्मठ चेहरों को विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा या राज्यसभा का टिकट दिलाने में वास्तव में सक्षम हैं? क्या इनके पास दलों के भीतर टिकट वितरण और नीति-निर्धारण में कोई वास्तविक ‘वीटो पावर’ या निर्णायक शक्ति है? यदि उत्तर ‘ना’ है, तो यह साफ है कि यह प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक छल है। दलों के आलाकमान ने यह भली-भांति भांप लिया है कि इस समाज के भीतर अब नेतृत्व और आत्मसम्मान की एक गहरी तड़प है। इसलिए, उन्होंने सत्ता में वास्तविक हिस्सेदारी (जैसे कैबिनेट मंत्री, राज्यसभा सीट या प्रभावी मंत्रालय) देने के बजाय संगठन का ऐसा ‘झुनझुना’ थमा दिया है, जो चुनावी रैलियों में बजता तो जोर से है, लेकिन उससे समाज की तकदीर का एक पन्ना भी नहीं बदलता। यह ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा’ की सामंती नीति को आधुनिक कलेवर में पेश करने की चाल है। जब तक कोई समाज सीधे सदन में अपनी स्वतंत्र और मजबूत आवाज नहीं पहुंचाता, तब तक नीतियां उसके हक में कभी नहीं बनतीं। केवल सांगठनिक पदों पर आसीन चेहरे चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने वाले प्रबंधकों और सजावटी किरदारों से अधिक कुछ साबित नहीं होते। यह स्थिति समाज को सशक्त करने के बजाय उसे अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बांटने (डिवाइड एण्ड रूल) की एक गहरी साजिश है, ताकि समाज कभी एकजुट होकर अपने बुनियादी हकों, जैसे ‘धनगर आरक्षण’ के लिए एक होकर हुंकार न भर सके। आगामी चुनावों में वोट की चोट करने से पहले अब गड़रिया समाज को बहुत गहराई से सोचना होगा कि उसे केवल सांगठनिक पदों की झूठी चमक चाहिए या सदन में अपनी वास्तविक और मजबूत राजनैतिक ताकत। जब तक समाज भ्रमित करने वाली इस चौतरफा राजनीतिक चाल को नहीं समझेगा, तब तक वह केवल राजनीतिक दलों की बिसात पर एक बंधुआ मोहरा बना रहेगा और उसका वास्तविक उत्थान हमेशा दूर की कौड़ी साबित होगा। अब समय आ गया है कि समाज इस राजनीतिक बंटवारे को नकार कर अपने हक की सीधी लड़ाई लड़े।
-शैलेन्द्र विक्रम पाल, बरेली
मो. 9359105473

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