खाप-पंचायत में जकड़ा, ग्रामीण सभ्य-समाज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
इनके निजी मुकदमे, इनका उलटा राज-काज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
देश का कानून, न्याय-व्यवस्था से संतुष्ट नहीं
सम-गोत्रीय, सपिंड विवाह से होते रुष्ट नहीं
बहिष्कार का डर कायम है, मर्यादा बर्बाद!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
खाप-पंचायत में जकड़ा, ग्रामीण सभ्य-समाज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
कहने को स्वतंत्र है भारत, दूर है आजादी
अभी तलक लाचार बहुत हैं, गाँवों के रहवासी,
हर छाती पर बैठ मूंग भी, दलते हैं गुटबाज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
खाप-पंचायत में जकड़ा, ग्रामीण सभ्य-समाज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
एक पैसे की मदद नहीं, फिर भी बंधे हुए हैं
अन्य प्रांत के स्वजातियों से भी, ये कटे हुए हैं
आवारा पशु बांध-छांद के, रखने जैसा काज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
खाप-पंचायत में जकड़ा, ग्रामीण सभ्य-समाज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
अन्य जात-धर्म की नारी, निज-जाति का पुरुष
ऐसे परिजन, मोटी गड्डियाँ देते डाँड़ स्वरूप
रसूखदार पंजे जकड़ें, और मुँह मारते स्वाद!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
खाप-पंचायत में जकड़ा, ग्रामीण सभ्य-समाज!
पीड़ित-जन को न आए लाज!!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
खाप-पंचायत में जकड़ा!
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