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मर्यादा और सामाजिक सुदृढ़ता : क्षणिक सुख बनाम भावी पीढ़ी का भविष्य!

आधुनिक भूमंडलीकरण के इस दौर में जहाँ पारदर्शिता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है, वहीं समाज की बुनियादी व्यवस्था और नैतिक मूल्यों के संरक्षण पर भी एक गंभीर विमर्श की जरूरत है। किसी भी सभ्य अथवा स्वस्थ समाज की नींव उसकी पारिवारिक संरचना और नैतिक सीमाओं पर टिकी होती है। जब इन सीमाओं का उल्लंघन होता है, जिसे सामाजिक भाषा में ‘नाजायज संबंध’ या अनैतिक भटकाव कहा जाता है, तो उसका प्रभाव केवल 2 व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होता है।
तार्किक दृष्टिकोण : कारण और प्रभाव का नियम-वैज्ञानिक और तार्किक रूप से यह अकाट्य सत्य है कि हर क्रिया की एक निश्चित प्रतिक्रिया होती है। गलत प्राथमिकताओं और निर्णयों का परिणाम अंतत: समाज के लिए वृहद हानिकारक ही सिद्ध होता है।
संस्थागत क्षरण-परिवार समाज की सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। अनैतिक संबंधों के कारण इस इकाई में अविश्वास, मानसिक तनाव और बिखराव पैदा हो रहा है।
संसाधनों और शक्ति का दुरुपयोग-समाज में कई बार आर्थिक, राजनीतिक या जातीय प्रभाव का उपयोग करके अनैतिक कृत्यों को सही ठहराने या उन्हें दबाने का प्रयास समय-समय पर किया जाता रहा है। चंद प्रभावशालियों द्वारा बंद कमरों में लिए गए निर्णय या दिए गए वैधानिक संरक्षण, आम जनमानस की स्वाभाविक नैतिक चेतना को नहीं बदल सकते।
भावनात्मक दृष्टिकोण : निर्दोषों पर आघात- इस पूरे विमर्श का सबसे संवेदनशील और दुखद पहलू इसका मानवीय पक्ष है। क्षणिक सुख या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए उठाए गए कदम का खामियाजा उन निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ता है जिनका इसमें कोई दोष नहीं होता।
भावी पीढ़ी का भविष्य-माता-पिता या संरक्षकों के आपसी बिखराव और अनैतिक आचरण का सीधा और गहरा मानसिक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। उनका बचपन असुरक्षा, हीनभावना और मानसिक अवसाद की भेंट चढ़ जाता है।
पारिवारिक बिखराव-एक हँसता-खेलता परिवार जब अविश्वास की वेदी पर बलि चढ़ता है, तो जीवनसाथी और वृद्ध माता-पिता को असहनीय पीड़ा, सामाजिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।
नीति और सामाजिक दिशा-निर्देश-अल्पकालिक लाभ, क्षणिक आकर्षण या व्यक्तिवाद के अंधानुकरण में सामाजिक मर्यादाओं को दांव पर लगाना आत्मघाती है। हमारी समृद्ध सांस्कृतिक रीति-नीति और सामाजिक दिशा-निर्देश हमें सिखाते हैं कि समाज का हित सदैव व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर होना चाहिए।
निष्कर्ष/अनुतोष-सच्ची आधुनिकता और बौद्धिकता वह है जो स्वतंत्रता के साथ-साथ जिम्मेदारी का भी स्वागत करे। हमें एक ऐसे जागरूक समाज का निर्माण करना होगा जहाँ शक्ति के बल पर गलत को सही न ठहराया जा सके। अपनी आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ, सुरक्षित और नैतिक वातावरण देना ही हमारे समाज का वास्तविक दायित्व है।
-नरेश कुमार पाल
मो 9997326200

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