कैसे यह सफर पूरा हो गया,
पता ही नहीं चला।
क्या पाया, क्या खोया,
पता ही नहीं चला।
बचपन बीत गया,
जवानी भी ढल गई,
कब बुजुर्ग हो गए,
पता ही नहीं चला।
कल तक बेटा था,
कब ससुर बन गया,
पता ही नहीं चला।
किसी ने कहा बेवकूफ है,
किसी ने कहा होशियार है,
क्या सच था,
पता ही नहीं चला।
पहले पिताजी की चली,
फिर पत्नी की चली,
फिर बच्चों की चली,
मेरी कब चली,
पता ही नहीं चला।
दिल कहता है अभी जवान हूँ,
उम्र कहती है अब समझदार हूँ,
इसी उधेड़बुन में कब
पाँव थक गए,
पता ही नहीं चला।
बाल झड़ गए,
गाल ढल गए,
चश्मा लग गया,
कब रूप बदल गया,
पता ही नहीं चला।
कल तक परिवार एक साथ था,
कब परिवार बिखर गया,
कब अपने दूर हो गए,
पता ही नहीं चला।
भाई-बहन, रिश्तेदार
अब सिर्फ तीज-त्योहारों पर मिलते हैं,
कब हँसता-खेलता जीवन उदास हो गया,
पता ही नहीं चला।
जिंदगी जी भरकर जी लो,
बाद में ऐसा मत कहना कि…
पता ही नहीं चला।
प्रस्तुति : श्याम शंकर पाल उर्फ सचिन
हरिकमल दर्पण हरियाणा प्रभारी
पाल एकता मंच राष्ट्रीय सचिव
भारतीय जीवन बीमा निगम
सीनियर इंश्योरेंस एडवाइजर
मो. 9891441417, 9999007349
पता ही नहीं चला…
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