(मधुगीति 260408 C) 23:20
हर जीव चतुर प्रचुर रहा,
विश्व विवर में;
सोचे वही है ब्रह्म रहा,
निज खयाल में!
पाई है जो भी शक्ति उसने,
उसको बहु लगी;
लागा उसे दिखाने राह,
अहं आ मही!
ना जाना और कितनी क्षमता,
उसके उर रही;
ना समझा ऊर्जा कितनी छिपी,
जीव हर रही!
परमाणु हर ही ब्रह्म-कण है,
जाना ना किया;
जीवाणु गण है शिव का रहा,
समझा ना किया!
कर देगा कौन किसको भस्म,
महा-विश्व में;
‘मधु’ के महत में विष्णु विधृत,
ब्रह्म भाव में!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
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