भेड़ें चराने वाले एक संघर्षशील बालक से विमुक्त जातियों के संवैधानिक अधिकारों की आवाज बनने तक का सफर
बरखा राम जो चेयरमैन विमुक्त जाति वेलफेयर बोर्ड पंजाब सरकार, कोऑर्डिनेटर गड़रिया समाज भलाई संगठन व राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय भेड़ पालक संघ हैं, उनका जीवन परिचय समाज के सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
- परिचय : अभावों की धरती से अधिकारों के संघर्ष तक
किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से लड़कर हासिल किए गए उसके अनुभवों, विचारों और संकल्पों से निर्मित होता है। बरखा राम का जीवन इसी सत्य का सशक्त उदाहरण है। उनका जीवन केवल व्यक्तिगत संघर्ष, शिक्षा और सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस समाज की पीड़ा, स्वाभिमान और अधिकारों के लिए निरंतर जारी संघर्ष की गाथा भी है, जो सदियों से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का सामना करता आया है। पंजाब के जिला एस.ए.एस. नगर (मोहाली) की तहसील डेराबस्सी के गांव जड़ौत में गड़रिया भेड़ पालक समुदाय के एक साधारण परिवार में जन्मे बरखा राम ने बचपन से ही गरीबी, कठिन परिश्रम, सामाजिक उपेक्षा और घुमंतू जीवन की चुनौतियों को बहुत निकट से देखा। जिन परिस्थितियों में सामान्य व्यक्ति अपने सपनों को सीमित कर लेता है, उन्हीं परिस्थितियों ने उनके भीतर शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक परिवर्तन की ऐसी भावना पैदा की, जिसने आगे चलकर उनके जीवन की दिशा निर्धारित की। आज उनकी पहचान केवल एक पूर्व रेल कर्मचारी अथवा पंजाब सरकार के एक बोर्ड के चेयरमैन के रूप में नहीं, बल्कि विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्षरत एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी है। - परिवार और बचपन : संघर्षों में पला एक संकल्प
बरखा राम के पिता पाला राम जिन्हें सतपाल सिंह के नाम से भी जाना जाता है और माता श्रीमती सोना देवी ने अत्यंत साधारण परिस्थितियों में अपने परिवार का पालन-पोषण किया। उनके दादा स्वर्गीय साधु राम भेड़पालन के साथ-साथ कृषि कार्य भी करते थे। परिवार की आजीविका मुख्यत: मेहनत-मजदूरी, पशुपालन और खेती पर निर्भर थी। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि उनके दादा-दादी और माता-पिता स्वयं औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके। इसके बावजूद उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझा और अपने पांचों बच्चों—तीन बेटियों और दो बेटों को विद्यालय भेजने का निर्णय लिया। यह उस दौर के एक साधारण ग्रामीण परिवार की दूरदर्शिता और अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के प्रति समर्पण का परिचायक था। बरखा राम की एक बड़ी बहन, दो छोटी बहनें और एक छोटा भाई है। सीमित साधनों के बीच पले-बढ़े इस परिवार में शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं था, लेकिन परिवार की मेहनत और बच्चों की लगन ने आगे बढ़ने का रास्ता बनाया। - भेड़ों के साथ बीता बचपन : जिसने जीवन का उद्देश्य निर्धारित किया
बरखा राम ने दसवीं कक्षा गांव के विद्यालय से और बारहवीं कक्षा डेराबस्सी के सरकारी कॉलेज से उत्तीर्ण की। उनकी पढ़ाई के दिनों में घर में बिजली तक की नियमित व्यवस्था नहीं थी। वे दीपक की रोशनी में पढ़ाई करते थे। विद्यालय से लौटने के बाद उन्हें अपने दादा के साथ भेड़ें चराने के लिए जाना पड़ता था। दिन का बड़ा हिस्सा पशुओं के साथ खेतों, खलिहानों और गांव के आसपास बीतता था। इस दौरान उन्हें सामाजिक भेदभाव, अपमानजनक टिप्पणियों, गालियों और कभी-कभी मारपीट जैसी परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता था। उनके बचपन की सबसे पीड़ादायक स्मृतियों में से एक वह समय था, जब उन्हें सुबह लगभग चार बजे उठकर भेड़ों को चराने ले जाना पड़ता था। सामाजिक और आर्थिक विवशताओं के बीच पशुओं के लिए भोजन जुटाने की जिम्मेदारी ने उन्हें ऐसी परिस्थितियों से परिचित कराया, जिनकी कल्पना करना भी कठिन है। उन दिनों की एक घटना ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। उन्हें महसूस हुआ कि जिस समाज के बच्चों को सम्मान और समान अवसर मिलने चाहिए, उसी समाज के बच्चे अभाव और सामाजिक उपेक्षा के कारण अपमानजनक परिस्थितियों में जीवन बिताने को विवश हैं। उनके मन में बार-बार प्रश्न उठता था कि आखिर गड़रिया समाज की जिंदगी ऐसी क्यों है? पशुपालन करने वाले मेहनतकश परिवारों को सामाजिक सम्मान, शिक्षा और बेहतर जीवन के अवसर क्यों नहीं मिलते? यही प्रश्न आगे चलकर उनके सामाजिक संघर्ष की आधारशिला बने। पशुओं को चराते समय भी वे अपनी पुस्तकें साथ रखते थे। जहां अन्य बच्चों को पढ़ाई के लिए एक निश्चित समय और स्थान मिलता था, वहीं बरखा राम ने अपने सीमित अवसरों के बीच ही अध्ययन करने की आदत विकसित की। उनका बचपन कठिन था, लेकिन इसी कठिनाई ने उन्हें समाज की वास्तविक समस्याओं को समझने की दृष्टि प्रदान की। - शिक्षा और आत्मनिर्भरता : कठिन रास्तों पर निरंतर आगे बढ़ना
बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना उनकी प्राथमिकता बन गई। इसी कारण उन्होंने नियमित कॉलेज की आगे की पढ़ाई रोककर औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) में रेफ्रिजरेशन एवं एयर कंडीशनिंग ट्रेड में प्रवेश लिया। इसके साथ-साथ उन्होंने पत्राचार माध्यम से बी.ए. की पढ़ाई भी जारी रखी। आईटीआई का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने अल्फा ड्रग कंपनी में एक वर्ष की अप्रेंटिसशिप की। इसके बाद अंबाला छावनी स्थित वायुसेना परिसर में एयर कंडीशनिंग प्लांट से संबंधित कार्य में ठेकेदार के माध्यम से एक वर्ष तक निजी नौकरी की। इन अनुभवों ने उन्हें तकनीकी ज्ञान, अनुशासन, कार्यकुशलता और आत्मनिर्भरता का महत्व सिखाया। उन्होंने अपनी परिस्थितियों को अपनी प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया और आगे बढ़ने के नए रास्ते तलाशते रहे। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। बैंकिंग, रेलवे, कर्मचारी चयन आयोग और संघ लोक सेवा आयोग सहित अनेक परीक्षाओं में भाग लेने का निर्णय लिया। विद्यालय और कॉलेज के दिनों में पढ़ाई की तुलना में भेड़पालन में अधिक समय व्यतीत होने के कारण उन्हें अपनी शैक्षणिक बुनियाद मजबूत करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ी। उन्होंने स्वयं को अध्ययन के प्रति समर्पित किया और प्रतियोगी परीक्षाओं की पत्रिकाओं, विशेषकर ‘प्रतियोगिता किरण’, के माध्यम से नियमित अभ्यास किया। लगातार मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम यह हुआ कि वे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने लगे। अंतत: वर्ष 2000 में रेलवे भर्ती बोर्ड, चंडीगढ़ के माध्यम से सहायक लोको पायलट की परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्होंने भारतीय रेलवे के अंबाला मंडल में नौकरी प्राप्त की। यह उपलब्धि केवल एक सरकारी नौकरी प्राप्त करना नहीं थी। यह उस युवा की सफलता थी, जिसने दीपक की रोशनी में पढ़ते हुए, भेड़ें चराते हुए और अभावों से जूझते हुए अपने लिए एक नया भविष्य बनाया था। रेलवे की नौकरी में आने के बाद भी उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियों को नहीं भुलाया और अपने छोटे भाई की शिक्षा तथा परिवार की उन्नति के लिए निरंतर प्रयास करते रहे। - पारिवारिक जीवन : शिक्षा और प्रगति में जीवनसाथी का योगदान
वर्ष 2001 में बरखा राम का विवाह हरियाणा के जिला करनाल के गांव खेड़ा निवासी पूना राम की सुपुत्री श्रीमती रमा से हुआ। विवाह के समय श्रीमती रमा बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण कर कॉलेज में प्रवेश ले चुकी थीं। विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखने का निर्णय लिया। पत्राचार माध्यम से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की बी.एड. प्रवेश परीक्षा में भाग लिया। प्रवेश परीक्षा में अच्छा स्थान प्राप्त करने के बाद उन्होंने चंडीगढ़ के सरकारी कॉलेज से बी.एड. की शिक्षा प्राप्त की। इसी दौरान बरखा राम की छोटी बहन ने भी लालड़ू के एक निजी कॉलेज से बी.एड. की पढ़ाई पूरी की। इस प्रकार सीमित आर्थिक संसाधनों वाले परिवार में उच्च शिक्षा प्राप्त करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई। वर्ष 2008 में श्रीमती रमा ने कर्मचारी चयन आयोग की स्नातक स्तर की प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण की और केंद्र सरकार के जनगणना विभाग में नौकरी प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने सांख्यिकी अन्वेषक ग्रेड-1 के रूप में राजपत्रित अधिकारी का दायित्व संभाला। परिवार की यह शैक्षणिक और व्यावसायिक प्रगति इस बात का प्रमाण है कि कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा को प्राथमिकता देने वाला परिवार अपनी अगली पीढ़ी के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है। बरखा राम के जीवन में परिवार का सहयोग महत्वपूर्ण रहा। व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ परिवार को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाना उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। - व्यक्तिगत सफलता से सामाजिक जिम्मेदारी तक
रेलवे की नौकरी ने बरखा राम को आर्थिक स्थिरता प्रदान की, लेकिन बचपन में देखी गई सामाजिक विषमता उनके मन से कभी दूर नहीं हुई। भेड़पालन के दौरान झेला गया अपमान, घुमंतू जीवन की कठिनाइयां और अपने समुदाय के बच्चों के सामने मौजूद सीमित अवसर उन्हें लगातार सोचने के लिए प्रेरित करते रहे। उनके मन में यह विश्वास मजबूत होता गया कि गड़रिया समुदाय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक अनुभवों, पारंपरिक आजीविका और प्रशासनिक अभिलेखों का अध्ययन आवश्यक है। इसी खोज के दौरान उन्हें पंजाब सरकार द्वारा जारी विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों से संबंधित सूची और अधिसूचना की जानकारी मिली, जिसमें गड़रिया जाति का नाम दर्ज था। यह जानकारी उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई। उन्हें महसूस हुआ कि उनके समुदाय की समस्याएं केवल गरीबी अथवा व्यक्तिगत कठिनाइयों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक उपेक्षा और नीतिगत पहचान से जुड़े प्रश्न भी हैं। यहीं से उनके संघर्ष ने व्यक्तिगत जीवन की सीमाओं को पार कर सामाजिक अधिकारों की दिशा में कदम बढ़ाया। - रेणके आयोग के साथ संवाद : समुदाय की वास्तविक स्थिति को सामने लाने का प्रयास
वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए बालकृष्ण रेणके की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया। बरखा राम ने इस आयोग की गतिविधियों में सक्रिय रुचि ली। वे दिल्ली जाकर आयोग की बैठकों में शामिल हुए और पत्राचार के माध्यम से अपने समुदाय की समस्याओं तथा आवश्यकताओं को सामने रखने का प्रयास किया। जब आयोग पंजाब पहुंचा, तब उन्होंने गड़रिया समुदाय के लोगों के साथ मिलकर आयोग के प्रतिनिधियों को भेड़पालक परिवारों की वास्तविक जीवन-स्थितियों से परिचित कराया। उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि किस प्रकार पशुपालन, मौसमी आवाजाही, आजीविका की अनिश्चितता और सामाजिक उपेक्षा इन परिवारों के जीवन को प्रभावित करती हैं। वर्ष 2008 में आयोग ने केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों की समस्याओं के समाधान के लिए अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण सहित विभिन्न उपायों की सिफारिशें की गई थीं। हालांकि इन सिफारिशों का व्यापक स्तर पर अपेक्षित क्रियान्वयन नहीं हो पाया, लेकिन इस प्रक्रिया ने बरखा राम के संकल्प को और मजबूत किया। उन्होंने महसूस किया कि समुदाय की समस्याओं को दर्ज कराना पहला कदम है, जबकि उन्हें प्रभावी नीतियों और अधिकारों में परिवर्तित करवाने के लिए निरंतर संघर्ष आवश्यक है। - इदाते आयोग के समक्ष गड़रिया समुदाय की आवाज
वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए भीकू राम इदाते की अध्यक्षता में एक अन्य आयोग का गठन किया। बरखा राम ने इस आयोग के साथ भी संवाद जारी रखा। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर जाकर गड़रिया भेड़पालक समुदाय की जीवनशैली, पारंपरिक आजीविका, घुमंतू परिस्थितियों और सामाजिक चुनौतियों को सामने रखा। उन्होंने आयोग को पत्र लिखे और समुदाय की पहचान तथा समस्याओं से संबंधित तथ्यों को दर्ज कराने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गड़रिया समुदाय की वास्तविक स्थिति का अध्ययन हो और उसकी समस्याओं को व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया जाए। वर्ष 2018 में इस आयोग ने केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में विभिन्न कल्याणकारी उपायों के साथ विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों के लिए अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश भी की गई थी। इसके बाद इन समुदायों के कल्याण के लिए केंद्र स्तर पर विकास एवं कल्याण बोर्ड की स्थापना और योजनाओं की दिशा में कदम उठाए गए। वर्ष 2022 में विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों के लिए आर्थिक सशक्तीकरण योजना (एसईईडी) आरंभ की गई, जिसके लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। बरखा राम का कहना है कि पंजाब में इन योजनाओं का लाभ संबंधित समुदायों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाया। विशेष रूप से वे इस बात पर जोर देते रहे कि योजनाओं का वास्तविक लाभ सुनिश्चित करने के लिए समुदायों की स्पष्ट पहचान, प्रमाणपत्र, प्रशासनिक समन्वय और जागरूकता आवश्यक है। उनका संघर्ष इसी अंतर को दूर करने की दिशा में निरंतर जारी रहा—नीतियों में घोषित अवसरों को जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाने का संघर्ष। - स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति : समाज के लिए जीवन समर्पित करने का निर्णय
वर्षों तक भारतीय रेलवे में सेवा देने के बाद बरखा राम ने परिवार के साथ विचार-विमर्श करके अक्टूबर 2024 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का निर्णय किया। इस प्रकार उन्होंने अपनी नियमित नौकरी समाप्त होने से लगभग दस वर्ष पहले ही सामाजिक कार्यों के लिए अधिक समय उपलब्ध कराने का रास्ता चुना। यह निर्णय उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। अब उनके सामने केवल अपने परिवार की उन्नति का लक्ष्य नहीं था, बल्कि अपने समुदाय और अन्य विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समूहों की समस्याओं के समाधान के लिए निरंतर काम करने का अवसर भी था। उन्होंने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के समक्ष समुदायों की समस्याएं उठाने, संबंधित अधिकारियों से संवाद करने, अभिलेखों और सूचियों का अध्ययन करने तथा कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए प्रयास तेज कर दिए। उनकी प्राथमिकताओं में समुदाय की पहचान, अलग जाति प्रमाणपत्र, योजनाओं तक पहुंच, शिक्षा, सामाजिक सम्मान और शासन-प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व जैसे विषय प्रमुख रहे। - गड़रिया पशुपालकों की सुरक्षा के लिए प्रयास
सामाजिक अधिकारों के संघर्ष के साथ-साथ बरखा राम ने गड़रिया भेड़पालक परिवारों की तात्कालिक समस्याओं को भी गंभीरता से उठाया। पंजाब में कुछ भेड़पालक परिवारों की भेड़ों की चोरी और लूट की घटनाओं ने समुदाय में भय और चिंता पैदा कर दी थी। पशुपालन इन परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन है। ऐसे में पशुओं की चोरी का अर्थ केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि परिवार के भविष्य और जीवनयापन पर गंभीर संकट भी है। बरखा राम ने अपनी टीम के साथ इस समस्या को संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के समक्ष उठाया। मोहाली के विधायक सरदार कुलवंत सिंह के सहयोग से पुलिस प्रशासन तक मामला पहुंचाया गया और कथित पशु चोरी की घटनाओं में शामिल एक गिरोह के विरुद्ध कार्रवाई हुई। इस प्रयास ने समुदाय में यह संदेश दिया कि सामाजिक नेतृत्व का अर्थ केवल बड़े मंचों पर भाषण देना नहीं, बल्कि जरूरत के समय प्रभावित परिवारों के साथ खड़े रहना और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासनिक प्रयास करना भी है। - पंजाब सरकार द्वारा विमुक्त जाति वेलफेयर बोर्ड के चेयरमैन की जिम्मेदारी
बरखा राम के अनुसार, विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों के अधिकारों के लिए उनके निरंतर प्रयासों और सामाजिक गतिविधियों पर पंजाब सरकार का ध्यान गया। 15 सितंबर 2025 को पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार भगवंत सिंह मान ने उन्हें पंजाब सरकार के विमुक्त जाति वेलफेयर बोर्ड का चेयरमैन नियुक्त किया। यह नियुक्ति उनके लिए केवल एक पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि लंबे समय से उठाए जा रहे सामाजिक प्रश्नों को संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ाने का अवसर बनी। उन्होंने इस जिम्मेदारी को अपने समुदाय और अन्य विमुक्त जातियों के हितों से जोड़कर देखा। उनके लिए यह आवश्यक था कि विमुक्त जातियों की समस्याएं केवल ज्ञापनों, बैठकों और सार्वजनिक वक्तव्यों तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें सरकारी नीतियों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों में उचित स्थान मिले। चेयरमैन के रूप में उन्होंने पंजाब सरकार और संबंधित विभागों के साथ पत्राचार के माध्यम से कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए। इनमें विमुक्त जातियों की अलग पहचान, जाति प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था, केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ और जाति आधारित आंकड़ों में समुदायों का समुचित प्रतिनिधित्व प्रमुख रहे। - विमुक्त जातियों की अलग पहचान और जनगणना में प्रतिनिधित्व की पहल
बरखा राम के सामाजिक प्रयासों का एक महत्वपूर्ण पक्ष विमुक्त जातियों के लिए अलग पहचान और विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता को सामने लाना रहा है। उनका मानना है कि किसी भी समुदाय की वास्तविक सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति को समझने के लिए उसके संबंध में प्रमाणिक आंकड़े उपलब्ध होना आवश्यक है। यदि कोई समुदाय सरकारी सर्वेक्षणों और प्रशासनिक अभिलेखों में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होता, तो उसके लिए लक्षित योजनाएं तैयार करना और उनका लाभ सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है। इसी उद्देश्य से उन्होंने पंजाब सरकार के समक्ष यह मांग उठाई कि राज्य में प्रस्तावित जाति आधारित सर्वेक्षण में विमुक्त जातियों की अलग पहचान के लिए उपयुक्त कॉलम शामिल किया जाए। उनके अनुसार, वर्ष 2026 में पंजाब सरकार द्वारा ड्रग संबंधी सर्वेक्षण और आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से जाति आधारित आंकड़े एकत्र करने की प्रस्तावित प्रक्रिया में विमुक्त जातियों के लिए अलग कॉलम शामिल कराने हेतु उन्होंने आम आदमी पार्टी के संगठन के वरिष्ठ नेतृत्व और मुख्यमंत्री के समक्ष लगातार आग्रह किया। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप, उनके दावे के अनुसार, राज्य की प्रस्तावित प्रक्रिया में विमुक्त जातियों के लिए अलग कॉलम शामिल करने का निर्णय लिया गया। यदि इस व्यवस्था का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो इससे विमुक्त जातियों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करने, उनकी आवश्यकताओं की पहचान करने और भविष्य की कल्याणकारी नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिल सकती है। बरखा राम इस विषय को केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि विमुक्त समुदायों की नीतिगत पहचान और भविष्य की योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण कदम मानते हैं। - 31 अगस्त 2026 : विमुक्त जाति दिवस के माध्यम से अधिकारों की आवाज
31 अगस्त 2026 को बरखा राम ने डेराबस्सी के निकट ग्लास पैलेस में विमुक्त जाति दिवस के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आयोजन का उद्देश्य विमुक्त जातियों के ऐतिहासिक अनुभवों, संघर्षों और वर्तमान समस्याओं को सामने लाना तथा समाज में शिक्षा, जागरूकता और अधिकारों के प्रति चेतना को बढ़ावा देना था। विमुक्त समुदायों का इतिहास औपनिवेशिक शासन के दौरान लगाए गए दमनकारी कानूनों और स्वतंत्रता के बाद उनके पुनर्वास तथा सामाजिक पुनर्स्थापन की चुनौतियों से जुड़ा है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को याद करना केवल अतीत को दोहराना नहीं, बल्कि वर्तमान में इन समुदायों के सामने मौजूद असमानताओं को समझना भी है। इस अवसर पर बरखा राम ने पत्रों और प्रेस के माध्यम से पंजाब के मुख्यमंत्री के समक्ष तीन प्रमुख मांगें रखीं।
पहली मांग : विमुक्त जातियों के लिए अलग जाति प्रमाणपत्र-उन्होंने आग्रह किया कि पंजाब में संबंधित विमुक्त जातियों के पात्र सदस्यों को स्पष्ट पहचान देने के लिए अलग प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की जाए, ताकि वे अपने लिए निर्धारित योजनाओं और सुविधाओं का लाभ प्राप्त कर सकें।
दूसरी मांग : गड़रिया समुदाय के लिए भवन-उन्होंने चंडीगढ़ अथवा मोहाली में गड़रिया समुदाय के लिए एक भवन उपलब्ध कराने की मांग रखी, जिससे समुदाय को सामाजिक, शैक्षणिक, संगठनात्मक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए एक स्थायी केंद्र मिल सके।
तीसरी मांग : भेड़-बकरियों के लिए बीमा और मुआवजा-उन्होंने भेड़ एवं बकरी पालन पर निर्भर परिवारों के लिए पशु बीमा तथा पशुओं की मृत्यु, प्राकृतिक आपदा या अन्य पात्र परिस्थितियों में मुआवजे की प्रभावी व्यवस्था की मांग की।
ये मांगें केवल किसी एक समुदाय की सुविधाओं तक सीमित नहीं हैं। इनके पीछे आजीविका की सुरक्षा, सामाजिक पहचान, सामुदायिक संगठन और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने की व्यापक भावना है। - पंजाब से राष्ट्रीय स्तर तक : विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों की साझा आवाज
बरखा राम का कार्यक्षेत्र केवल पंजाब तक सीमित नहीं रहा है। वे गड़रिया, धनगर और अन्य विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों के प्रश्नों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका दृष्टिकोण है कि विभिन्न राज्यों में रहने वाले इन समुदायों की सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों में अंतर हो सकता है, लेकिन शिक्षा, आजीविका, पहचान, कल्याणकारी योजनाओं और उचित प्रतिनिधित्व की चुनौतियां कई स्थानों पर समान दिखाई देती हैं। सितंबर 2026 में आंध्र प्रदेश के तिरुपति में आयोजित विमुक्त-घुमंतू पशुपालक समुदायों की विचार-गोष्ठी में उन्होंने भाग लिया। इस बैठक में धनगर, गड़रिया, कुरुबा और अन्य पशुपालक समुदायों से जुड़े प्रतिनिधियों ने विचार-विमर्श किया। इस संवाद के दौरान, उनके अनुसार, विभिन्न प्रतिनिधियों ने उनके सामाजिक प्रयासों का समर्थन किया और उन्हें राष्ट्रीय भेड़ पालक संघ का अध्यक्ष बनाने पर सहमति व्यक्त की। यह पहल पशुपालक समुदायों के बीच संवाद और संगठन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। इसके माध्यम से विभिन्न राज्यों के समुदाय अपने अनुभव साझा कर सकते हैं और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक आवाज विकसित कर सकते हैं। - कश्मीर यात्रा : बकरवाल समुदाय की समस्याओं को समझने का प्रयास
बरखा राम ने अपने परिवार के साथ जम्मू-कश्मीर की यात्रा के दौरान वहां के घुमंतू पशुपालक बकरवाल समुदाय के लोगों से भी मुलाकात की। गुलमर्ग क्षेत्र में उन्होंने बकरवाल पशुपालकों के जीवन, भेड़-बकरी पालन, मौसमी प्रवास, पशुओं की देखभाल, ऊन के बाजार, पशुओं की खरीद-बिक्री और आजीविका से जुड़ी कठिनाइयों को समझने का प्रयास किया। इस संवाद का उद्देश्य केवल एक समुदाय से मिलना नहीं था, बल्कि यह जानना भी था कि घुमंतू पशुपालक परिवार अपनी पारंपरिक आजीविका को बनाए रखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार, परिवहन और सरकारी सुविधाओं तक पहुंचने में किन चुनौतियों का सामना करते हैं। बरखा राम का मानना है कि नीतियां बनाते समय इन समुदायों के वास्तविक जीवन-अनुभवों को समझना आवश्यक है। स्थायी निवास पर आधारित प्रशासनिक व्यवस्थाएं कई बार उन परिवारों के लिए कठिनाई पैदा कर सकती हैं, जिनकी आजीविका मौसमी प्रवास और पशुपालन से जुड़ी होती है। कश्मीर यात्रा ने विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों की समस्याओं को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखने और उनके अनुभवों को दस्तावेज के रूप में सामने लाने के उनके प्रयासों को आगे बढ़ाया। - नेतृत्व की मूल भावना : पद से अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
बरखा राम के सार्वजनिक जीवन का केंद्रीय विचार यह है कि सामाजिक नेतृत्व का मूल्य पद, प्रतिष्ठा अथवा व्यक्तिगत उपलब्धियों से अधिक उसके द्वारा समाज के लिए किए गए कार्यों से निर्धारित होना चाहिए। उनका अपना जीवन इस विचार से जुड़ा हुआ है। जिस व्यक्ति ने बचपन में भेड़ें चराते समय सामाजिक उपेक्षा का सामना किया, उसी ने आगे चलकर शिक्षा प्राप्त की, प्रतियोगी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं, रेलवे में सरकारी सेवा की और फिर समाज के अधिकारों के लिए अपना समय समर्पित करने का निर्णय लिया। उनके संघर्ष के केंद्र में कुछ प्रमुख विषय लगातार दिखाई देते हैं—
-विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों की स्पष्ट पहचान और सम्मान।
-पात्र परिवारों के लिए अलग जाति प्रमाणपत्र और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच।
-बच्चों की शिक्षा, छात्रवृत्ति और प्रतियोगी परीक्षाओं के अवसरों को बढ़ावा देना।
-भेड़-बकरी पालकों की आजीविका की सुरक्षा तथा पशु बीमा और मुआवजे की व्यवस्था।
-समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आकलन के लिए विश्वसनीय आंकड़ों का संकलन।
-सरकारी नीतियों और योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन में विमुक्त समुदायों की प्रभावी भागीदारी।
-विभिन्न राज्यों के समुदायों के बीच संवाद, संगठन और साझा संघर्ष को प्रोत्साहन।
इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निरंतर संवाद, तथ्यात्मक दस्तावेजीकरण, लोकतांत्रिक भागीदारी और प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी प्रयास आवश्यक हैं। बरखा राम अपने सामाजिक कार्यों के माध्यम से इन्हीं रास्तों को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। - भविष्य का संकल्प : सम्मान, अवसर और समान भागीदारी
विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों की समस्याएं लंबे ऐतिहासिक अनुभवों से जुड़ी हुई हैं। इसलिए उनके समाधान के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, दस्तावेजी पहचान और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। बरखा राम की अपेक्षा है कि केंद्र और राज्य सरकारें इन समुदायों की जनसंख्या, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और वास्तविक आवश्यकताओं का अध्ययन करके उनके लिए प्रभावी नीतियां बनाएं। साथ ही, जहां आवश्यक हो, वहां कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप उचित प्रतिनिधित्व और अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए जाएं। उनका मानना है कि जब तक विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं को रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं के अवसर, पशुपालकों को सुरक्षित आजीविका तथा समाज को सम्मानजनक पहचान नहीं मिलेगी, तब तक समावेशी विकास का लक्ष्य अधूरा रहेगा। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियों को वे कठिनाइयां न झेलनी पड़ें, जिनका सामना उन्होंने अपने बचपन में किया था। जिस बालक को कभी भेड़ों के साथ खेतों में घूमते हुए अपमान सहना पड़ा, वह आज ऐसे समाज की कल्पना करता है, जिसमें किसी बच्चे की पहचान उसके परिवार के पेशे या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण उसके अवसरों को सीमित न करे। - निष्कर्ष : एक व्यक्ति की कहानी, अनेक समुदायों की उम्मीद
बरखा राम की जीवनगाथा संघर्ष, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक प्रतिबद्धता की एक प्रेरणादायक मिसाल है। गांव जड़ौत के एक साधारण गड़रिया भेड़पालक परिवार में जन्म लेने से लेकर भारतीय रेलवे में सहायक लोको पायलट के रूप में सेवा देने, परिवार को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने, विमुक्त जाति वेलफेयर बोर्ड के चेयरमैन की जिम्मेदारी संभालने और राष्ट्रीय स्तर पर पशुपालक समुदायों के प्रश्न उठाने तक की उनकी यात्रा अनेक अनुभवों से होकर गुजरी है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियां किसी व्यक्ति की अंतिम पहचान नहीं होतीं। यदि शिक्षा के प्रति लगन, अन्याय के प्रति संवेदनशीलता और समाज के लिए कुछ करने का संकल्प बना रहे, तो व्यक्तिगत संघर्ष व्यापक सामाजिक उद्देश्य का आधार बन सकता है। बरखा राम की यात्रा अभी जारी है। उनके सामने विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों के लिए पहचान, अवसर, सामाजिक सुरक्षा और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की लंबी चुनौती है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति सरकारों, प्रशासन, सामाजिक संगठनों और समुदायों के सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करेगी। फिर भी उनकी जीवन-यात्रा उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अभावों के बीच अपने भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं; उन परिवारों के लिए आशा है, जो शिक्षा के माध्यम से पीढ़ियों की स्थिति बदलना चाहते हैं; और उन समुदायों के लिए एक संदेश है, जो अपने सम्मान तथा अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष कर रहे हैं। बरखा राम का जीवन इस विश्वास को अभिव्यक्त करता है कि वास्तविक सफलता केवल स्वयं आगे बढ़ने में नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए रास्ते बनाने में है, जिनकी आवाज लंबे समय तक अनसुनी रही हो। उनकी कामना है कि विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों के बच्चों को शिक्षा, युवाओं को रोजगार, पशुपालकों को सुरक्षित आजीविका और समाज को सम्मानजनक पहचान मिले। शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़े और उन्हें देश की विकास यात्रा में समान अवसर प्राप्त हों। यही उनके संघर्ष की दिशा है, यही उनके सामाजिक जीवन का उद्देश्य और यही उस भविष्य की कल्पना है, जिसके लिए वे निरंतर प्रयासरत हैं। आज इन्होंने अपने बच्चों को भी उच्च शिक्षा के प्रति अग्रसर किया है। इनकी बड़ी बेटी कनाडा से डिग्री कर रही है और छोटी बेटी चंडीगढ़ के सरकारी कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही हैं। इनका बेटा छठी कक्षा में पढ़ रहा है। संघर्ष से स्वाभिमान तक, व्यक्तिगत सफलता से सामाजिक सेवा तक-बरखा राम की यह यात्रा निरंतर आगे बढ़ने वाले संकल्प की कहानी है। हरिकमल दर्पण परिवार की ओर से उन्हें बहुत-बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ। -सम्पादक