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समाज के प्रति भी जिम्मेदारी निभाना ही सच्ची मनुष्यता है!

मनुष्य का जीवन केवल उसके अपने सुख-दु:ख तक सीमित नहीं है। वह परिवार, रिश्तों और समाज से जुड़ा हुआ है। फिर भी आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक भावना तेजी से बढ़ रही है—‘मैं और मेरे अपने बस।’ अर्थात मैं अपने परिवार और अपने हित तक ही सीमित रहूँ, दूसरों से मुझे क्या लेना-देना? यह सोच पहली दृष्टि में सुविधाजनक लग सकती है, लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य को सामाजिक रूप से अकेला कर देती है। परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाना निश्चित रूप से हमारा पहला कर्तव्य है, परंतु परिवार की खुशहाली भी समाज के स्वस्थ वातावरण पर निर्भर करती है। यदि पड़ोसी दुखी है, समाज में कोई जरूरतमंद है, किसी बुजुर्ग को सहारे की आवश्यकता है या किसी बच्चे की पढ़ाई रुक रही है और हम यह कहकर आगे बढ़ जाएँ कि ‘यह मेरा काम नहीं है’, तो सामाजिक संवेदनाएँ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। हमारे संस्कारों ने हमें ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ना सिखाया है। माता-पिता, भाई-बहन और अपने परिवार का ध्यान रखते हुए समाज के प्रति भी थोड़ी जिम्मेदारी निभाना ही सच्ची मनुष्यता है। सहायता हमेशा धन से ही नहीं होती; किसी को सही सलाह देना, किसी दुखी व्यक्ति को दो शब्द की सांत्वना देना, किसी बुजुर्ग का सम्मान करना और जरूरत के समय साथ खड़ा होना भी सेवा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम ‘मैं और मेरे अपने’ की सीमा को थोड़ा बड़ा करें और उसे ‘मैं, मेरे अपने और मेरा समाज’ बनाएँ, क्योंकि अकेला परिवार सुखी होकर भी पूर्ण सुखी नहीं हो सकता। जब आसपास के लोग सुरक्षित, सम्मानित और सहयोगी होंगे, तभी हमारा अपना परिवार भी वास्तव में सुखी रहेगा। स्वार्थ से जीवन चलता है, लेकिन सहयोग से समाज बनता है। और अच्छे समाज से ही अच्छे परिवार और अच्छे इंसान बनते हैं।
-रणपाल सिंह, मेरठ
मो. 8881119008

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