स्वतंत्रता के 80वें वर्ष का उत्सव देश में उत्साह से मनाया गया। अरबों रुपये हमने खर्च किए केवल यह बताने के लिए देश को कि हम गुलाम थे। सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की, सभी ऐसे मौके पर बड़ी-बड़ी लुभावनी घोषणा करते हैं। अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए बड़े ही लच्छेदार भाषण भी देते हैं। किंतु उसका वास्तविक लाभ लोगों को मिल रहा है या नहीं, अंतिम व्यक्ति तक वह योजना पहुंच रही है या नहीं, इसकी समीक्षा ना तो सरकार करती है और ना ही उनके अधिकारी-कर्मचारी करते हैं। देश की जनता भी इस बारे में ज्यादा ध्यान नहीं देती। यदि देश की जनता थोड़ी-बहुत जागरूक है और अपनी कुछ बात रखना चाहती है तो उसकी आवाज को दबा दिया जाता है। मीडिया ऐसे समाचारों को प्रकाशित-प्रचारित भी नहीं करती है। वोट पाने की राजनीति अथवा लोगों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए समाज के लोगों को खुश रखने के लिए समाज विकास के लिए बोर्ड के गठन की घोषणा भी अनेक राज्यों में की जा रही है किंतु कई राज्यों में बोर्ड गठन के बाद उस पर कोई प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की गई। बोर्ड के निर्णय लेने के लिए व सर्वेक्षण करने के लिए केवल अधिकारियों को रखा गया जबकि उस समाज के लोगों को महत्व देना था, उनके साथ बैठक होनी थी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कुछ स्थानों पर सरकार बदल जाने से बोर्ड को निष्क्रिय कर दिया गया अथवा उस पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। ये घोषणाएं समाज के लोगों को केवल लुभाने व झुनझुना पकड़ाने के लिए की जा रही हैं। समाज को कोई फायदा नहीं मिल रहा है, केवल मानसिक रूप से लोग यह समझते हैं कि हमारे लिए बोर्ड का गठन हो रहा है किंतु वास्तविकता इससे दूर रहती है। सरकार घोषणा करती है कि हम राष्ट्र को नशामुक्त घोषित करेंगे, गोपालन व कृषि को आगे बढ़ाएंगे। इसके लिए मंत्रालय, बोर्ड, मंत्री भी बनाए गए हैं किंतु आप सूक्ष्म दृष्टि से देखेंगे तो आपको सारा काम उल्टा ही नजर आएगा। उदाहरण के लिए सरकार कहती है कि कृषि गोवंश के आधार पर हो, लेकिन भारत में बड़ी संख्या में बूचड़खाने संचालित हैं, गोवंश की हत्या होती है और उसका मांस डिब्बाबंद होकर सरकार के माध्यम से विदेशों को निर्यात किया जाता है। कृषि भूमि बंजर हो रही है क्योंकि उसमें विदेश से आयातित खाद और दवाएं उपयोग हो रही हैं। इसका सीधा असर राष्ट्र के करोड़ों लोगों के ऊपर स्वास्थ्य हानि के रूप में हो रहा है। पारंपरिक रोजगार घट रहे हैं, आयातित मशीनों द्वारा सारा काम हो रहा है। इससे कुटीर व छोटे उद्योग लगभग बंद होने के कगार पर हैं। किसानों को उनके उत्पादन का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पा रहा है। इसलिए विभिन्न राज्यों में आंदोलन होते हैं और उसके कारण अनेक लोग मारे जाते हैं। सरकार अरबो रुपये लगाकर प्रचार कर रही है कि हम नशामुक्त भारत का निर्माण करेंगे जो आश्चर्यजनक बात है। सरकार स्वयं तो देश में शराब बेच रही है, लाइसेंस दे रही है, इतना ही नहीं विदेशों को भी यहां शराब बेचने के लिए आमंत्रित कर रही है। यदि सरकार वास्तव में भारत को नशामुक्त बनाना चाहती है तो सरकार को नशे के व्यापार को तत्काल बंद करने का ऐलान करना चाहिए। भारत में अनेक ऐसे समाज हैं जो अति पिछड़े हैं और विकास से कोसों दूर हैं। ऐसे समाजों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस योजना नहीं बनती है ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके। इसलिए सरकार की घोषणाओं पर समाज के लोगों को सावधान रहने की आवश्यकता है क्योंकि सरकारी वादे झुनझुना से ज्यादा कुछ नहीं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर जो सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक संगठन बने हैं वह भी अपना चेहरा चमकाने के लिए सरकार की हां में हां मिलाते हैं, सरकार की गलत नीतियों का विरोध नहीं करते हैं। इसका खामियाजा देश के करोड़ों नागरिकों को भुगतना पड़ता है। इसलिए सावधान रहें और अपने भविष्य के निर्माता स्वयं बनें।
-नारायण प्रसाद पाली
वरिष्ठ नागरिक साहित्यकार गडरिया समाज छत्तीसगढ़
मो. 9575761235
सरकारी वादे झुनझुना से ज्यादा कुछ नहीं हैं!
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