दान का पइसा खा गया, बगुलों का महाझुंड!
निश-दिन भरती पेटियाँ, जनता उद्गम कुंड!!
भगवानों की झाँकियाँ, मंदिर, मठ, बाजार!
देखो और चढ़ाओ नगदी, सर्वोत्तम व्यापार!!
चूना लगे न फिटकरी, फिर भी चोखा रंग!
चंदा चोर चढ़ावा चटकर, लगाएँ त्रिपुंड अंग!!
दानी गुठली बैर की, बे-रौनक सी छाल!
तिलक चढ़ावा चाटकर, चमकाए निज खाल!!
दुष्प्रचार है, दान से बदले दुख, दुर्दिन!
श्रम अर्जित धन बचत करें, बनेंगे बिगड़े दिन!!
डर, लालच, तृष्णा तुझे, दबा रखी हर दौर!
शिक्षा, भाग्य सँवारती, मत पटको सर हर ठौर!!
सच को प्रभु सम जानिए, अंतस में पकड़ो!
सत्य का धागा सबल बहुत, बंध नभ में विचरो!!
दान करे आदिम-जाति, पिछड़ी, बहुजन जात!
जो चढ़ावा चाटते, ‘दानी को मारें लात’!!
करें परिश्रम, शिक्षित हों, जागेगा सौभाग्य!
सर-पर, पग-धर कर भागे, सर-पट दुख, दुर्भाग्य!!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
दान का पइसा खा गया!
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