इतिहास गवाह है कि जिस समाज ने अपने अधिकारों की रक्षा स्वयं नहीं की, उसका भविष्य दूसरों के भरोसे सुरक्षित नहीं रह सका। दुनिया में सम्मान उसी समाज को मिलता है जो अपने अधिकारों, अपने स्वाभिमान और अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक रहता है। आज यही प्रश्न धनगर समाज के सामने खड़ा है। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर जैसी न्यायप्रिय और लोककल्याणकारी महान विभूति के वंशज होने के बावजूद धनगर समाज आज भी अपने मूल अधिकारों और सम्मान के प्रश्नों पर संघर्षरत दिखाई देता है। यह स्थिति केवल चिंताजनक ही नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन का विषय भी है। चुनाव आते ही समाज की याद सभी को आने लगती है। बड़े-बड़े मंच सजते हैं, समाज के नाम पर सम्मेलन होते हैं, शोभायात्राएं निकलती हैं, मालाएं पहनाई जाती हैं, सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं और समाज को गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराया जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि जिन मुद्दों से समाज के लाखों परिवारों का वर्तमान और भविष्य जुड़ा हुआ है, उन पर उतनी गंभीरता क्यों दिखाई नहीं देती? कहावत है—‘भूखे भजन न होय गोपाला।’ जब युवाओं के सामने रोजगार, शिक्षा और अधिकारों का संकट हो, तब केवल भावनात्मक भाषण उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। समाज का उत्थान नारों से नहीं, अधिकारों के क्रियान्वयन से होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज भावनात्मक नारों और व्यक्तिपूजा से ऊपर उठकर यह पूछे कि उसके वास्तविक मुद्दों पर अब तक क्या प्रगति हुई है। केवल भीड़ जुटा लेना नेतृत्व का प्रमाण नहीं होता। ‘खाली बर्तन ज्यादा बजते हैं’—यह कहावत राजनीति और समाज दोनों पर समान रूप से लागू होती है। जो वास्तव में समाज का हितैषी होता है, वह मंचों पर कम और समाज के अधिकारों के लिए अधिक संघर्ष करता है। धनगर समाज को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में अधिकार किसी व्यक्ति या दल की कृपा से नहीं मिलते। अधिकार संविधान देता है और उनका संरक्षण कानून करता है। इसलिए समाज को अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा। यदि किसी अधिकार के क्रियान्वयन में कठिनाइयां हैं, तो उसके समाधान के लिए संगठित, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रयास आवश्यक हैं। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तब उत्पन्न होती है जब समाज के युवाओं को वास्तविक मुद्दों से भटकाकर केवल भावनात्मक विषयों में उलझा दिया जाता है। इतिहास बताता है कि ‘जब घर में आग लगी हो तो दीवारों पर रंगाई का कोई अर्थ नहीं होता।’ यदि समाज के मूल प्रश्न अनसुलझे हैं, तो केवल प्रतीकात्मक आयोजनों से भविष्य नहीं बदलेगा। आज धनगर समाज का युवा पढ़ रहा है, समझ रहा है और प्रश्न पूछ रहा है। वह जानना चाहता है कि समाज की ऊर्जा और संसाधन किन उद्देश्यों पर खर्च हो रहे हैं। वह यह भी देख रहा है कि उसके अधिकारों, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर कौन गंभीर है और कौन केवल चुनावी मौसम का साथी। लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी शक्ति होती है। ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ केवल कहावत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी सिद्धांत है। जो समाज की भावनाओं का उपयोग करेगा, उसे जनता के प्रश्नों का उत्तर भी देना होगा। जो समाज के वास्तविक मुद्दों को अनदेखा करेगा, उसे जनता के लोकतांत्रिक निर्णय का सामना भी करना होगा। धनगर समाज को आज आवश्यकता है-शिक्षा की, संवैधानिक जागरूकता की, संगठन की, तथ्यों पर आधारित संघर्ष की और अपने अधिकारों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की। याद रखिए ‘एक और एक ग्यारह होते हैं।’ जब समाज संगठित होता है, तो उसकी आवाज को अनदेखा करना आसान नहीं होता। लेकिन संगठन का आधार व्यक्तिपूजा नहीं, बल्कि अधिकारों के प्रति सामूहिक चेतना होना चाहिए। लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने न्याय, सेवा और जनकल्याण का मार्ग दिखाया था। उनके आदर्श हमें सिखाते हैं कि समाज का सम्मान केवल इतिहास के गौरव से नहीं, बल्कि वर्तमान की जागरूकता और भविष्य की तैयारी से सुरक्षित होता है। समय आ गया है कि धनगर समाज स्वयं से एक प्रश्न पूछे—क्या हम केवल दर्शक बने रहेंगे या अपने अधिकारों, अपने स्वाभिमान और अपने भविष्य के लिए संगठित होकर आगे बढ़ेंगे? क्योंकि इतिहास उन्हीं का सम्मान करता है जो अपने अधिकारों के लिए जागते हैं, संघर्ष करते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए मजबूत नींव तैयार करते हैं। नारा : ‘सम्मान नहीं, अधिकार चाहिए; दिखावा नहीं, न्याय चाहिए। धनगर समाज जाग चुका है, अब उसे उसका संवैधानिक सम्मान चाहिए।’
-गम्भीर धनगर, आगरा
मो. 9690470266
धनगर समाज कब तक भावनाओं में बहता रहेगा?
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