आज देश की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में सबसे बड़ी बहस आरक्षण है कि किसको कितना मिलना चाहिए? यह मुद्दा सभी राजनीतिक दलों में जोरों से चल रहा है। इधर, भारत का राजपत्र 14 अगस्त 2026 भारत के महा रजिस्ट्रार व जनगणना आयुक्त द्वारा जारी किया गया। उसमें ओबीसी का कॉलम प्रश्न 10 के साथ नहीं प्रदर्शित है जिसके बारे में सामाजिक व राजनीतिक दोनों मंचों पर बहस चल रही है। अब यह तय हो चला है कि भागीदारी की लड़ाई न केवल सरकारी नौकरियों में आएगी अपितु लोकसभा, विधानसभा व अन्य विधायी निकायों में भी आएगी ही आएगी। इधर देश का युवा सरकार के सीधे विरोध में आया है कि मुझे नौकरी, शिक्षा व अच्छा स्वास्थ्य मिले। सरकारें इस ओर नहीं सोच रही हैं, वह अपनी राजनीतिक गोटियाँ चलती रहती हैं। युवाओं को पहली बार लग रहा है कि सरकार और राजनीतिक दल उसे लगातार किनारे किए जा रहे हैं तो अपने को स्थापित करने के लिए वह आगे बढ़कर बहस में आया है। हम गडरिया, पाल, बघेल समाज के ओबीसी लोग जब जाति जनगणना में ही नहीं आएंगे तो सबका विकास अपने आप में बेमानी ही होगा। इसलिए सभी को यह तथ्य समझना चाहिए कि जातिगत जनगणना हो और सब की हो। अपने देश में राजनीतिक दल भी चुनाव जीतने के लिए ही एजेंडे बनाते हैं। युवा शक्ति को इसी के लिए अपने से जोड़ते हैं। यह युवा समझ चुका है, अब इनके झांसे और नारेबाजी में नहीं आने वाला है। ऐसे में मेरी अपनी सोच है कि गडरिया, पाल, बघेल समाज के जितने भी सामाजिक संगठन हैं वह एकजुट होकर सरकार को ओबीसी जनगणना में जातीय कालम बनवाने के लिए पत्र लिखें और राजनीतिक दल भी अपने एजेंडे में ओबीसी जाति जनगणना कराने की जिम्मेदारी सच्ची नीयत से लें। यह आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। ओबीसी समाज को राजनीतिक दलों के सिर्फ टिकट देकर लुभाने के तौर-तरीके से ऊपर उठकर उसे अपनी भागीदारी की लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। यह समझें कि विधायक सांसद तो कोई एक ही बनेगा, उससे समस्त ओबीसी समाज का भला नहीं होने वाला है।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
मो. 9794866822
आरक्षण को लेकर बहस कितनी सार्थक?
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