Harikamaldarpan

लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

समुद्र हूँ…

खेती-किसानी के साथ-साथ साहित्य सृजन का कार्य वह कड़ी मेहनत व दिल लगाकर करता था। बाहर कम ही लोगों से मिलता-जुलता। मोबाइल स्क्रॉल, रील और सोशल मीडिया पर सीमित समय खर्च करता, लेकिन पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएं खूब पढ़ता। डाकिया झोला भर- भरकर डाक लाता था…आसपास के लोग आश्चर्य करते कि ये आदमी क्या करता है कि हमारी समझ में ही नहीं आता? ताश नहीं खेलता, किसकी बहू किसके साथ नैन मटक्का कर रही है, फलां की लड़की किसके साथ भाग गई, अमुक का लड़का इस साल भी नौकरी नहीं पा सका। इन बातों में वह कोई रस नहीं लेता था। वह हमेशा अपने ही विचारों व सिद्धांतों में खोया रहता था। कुल मिलाकर अपने काम से काम। एक दिन खेत पर जा रहा था। गांव के एक श्रीमान ने व्यंग्य करते हुए कहा-‘ओरे मुकेशा! एक जगह पर रुकी हुई नदी का पानी सड़कर बास मारने लगता है।’ वह कुछ समय मौन रहा फिर थोड़ा मुस्कुराया और धीरे से बोला-‘महानुभाव! मैं रुकी हुई नदी नहीं… समुद्र हूँ, बस दिखता हूँ कि एक जगह रुका हुआ हूँ। मेरी लहरें निरंतर हिलोरें लेती रहती हैं।’ समुद्र! शांत, अनंत, रहस्यमयी और विशाल।
-मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
गांव-रिहावली, डाक-तारौली गुर्जर, फतेहाबाद, आगरा-283111
मो. 9627912535

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