जब तक स्वयं का सुधार नहीं होगा तब तक परिवार का सुधार नहीं हो सकता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सर्वप्रथम अपना सुधार ईमानदारीपूर्वक करने का प्रयास करना चाहिए। स्वयं के सुधार के बिना परिवार के सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती। भ्रष्टाचार का नाम आते ही हमारे मन, बुद्धि और विचार में केवल पैसों का भ्रष्टाचार ही चित्रांकन होता है। यह स्वाभाविक है क्योंकि हम भौतिक जगत की कल्पना करते हैं। किंतु सूक्ष्म जगत में भी भारी भ्रष्टाचार होता है जो दिखाई नहीं पड़ता, वह है अपनी जिम्मेदारी, अपने कर्तव्यों का ठीक ढंग से पालन नहीं करना। किसी बड़े पद पर पहुंच जाते हैं तो उस पद की प्रतिष्ठा और प्रभाव का दुरुपयोग करना आध्यात्मिक भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। इसीलिए हमारे द्वारा कहे गए और किए गए कार्य का प्रभाव परिवार के अन्य लोगों पर ठीक से नहीं पड़ता। इसलिए बेहतर है कि यदि हम और आप किसी बड़े पद पर हैं, किसी बड़ी जिम्मेवारी का निर्वहन करने के लिए हमें नियुक्त किया गया है तो हम पूरी ईमानदारी, निष्ठा, पारदर्शिता और प्रामाणिकता के साथ काम करें। प्रतिदिन सोने से पूर्व दिनभर के कार्यक्रमों व क्रियाकलापों की आत्म समीक्षा करते हुए स्वयं का मूल्यांकन करें और गलती का सुधार करें। अपने द्वारा जो कुछ भी कार्य बन पड़ता है उसका अहंकार ना करें क्योंकि हम और आप केवल माध्यम हैं, कार्य ईश्वर का है, शक्ति और प्रेरणा भी अदृश्य जगत से आ रही है। इसलिए किसी प्रकार का सम्मान स्वयं ना लें क्योंकि यह सामूहिक क्रियाकलाप है। बेहतर है कि सम्मान परिवार के लोगों को बांटने का उपक्रम करें। परिवार के समक्ष यदि हम गलत काम करते हैं, शराब पीते हैं, झगड़ा करते हैं, हत्या करते हैं, चोरी करते हैं एवं अन्य विभिन्न प्रकार के अपराध करते हैं और फिर परिवार के लोगों से सुधार की अपेक्षा करते हैं तो यह संभव नहीं है। यदि परिवार को प्रसन्न व उन्नत बनाना है तो सुधार की प्रक्रिया स्वयं से की जानी चाहिए ताकि परिवार के अन्य सदस्य आपको देखकर अपना रास्ता, अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकें, क्योंकि जो कुछ बच्चे अथवा परिवार के अन्य सदस्य देखते हैं वही सीखते हैं।
-नारायण प्रसाद पाली
प्रांतीय प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़
मो. 9575761235
अपना सुधार परिवार की सबसे बड़ी सेवा है!
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