नई दिल्ली। देश-विदेश में नागरी लिपि का प्रचार-प्रसार करने वाली प्रतिनिधि संस्था नागरी लिपि परिषद के 52वें स्थापना दिवस के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय सर्वभाषा नागरी लिपि आभासी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ आॅस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड, स्पेन, सूरीनाम और मॉरीशस सहित अनेक देशों से कवियों ने आनलाइन सहभागिता की। कार्यक्रम में हिंदी के साथ भोजपुरी, ब्रज, बुंदेली, अवधी, छत्तीसगढ़ी, पंजाबी, तमिल, बांग्ला, फ्रेंच और क्रियोल जैसी भाषाओं में मधुर और रोचक काव्य-पाठ किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व प्राचार्य एवं नागरी लिपि परिषद के उपाध्यक्ष डॉ. इस्माक अली ने की। बाबा कानपुरी (संतोष कुमार शर्मा) मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. हरिसिंह पाल, महामंत्री, नागरी लिपि परिषद ने किया। राजेंद्र पाल, शोधार्थी, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने संयोजक एवं संचालक के रूप में कार्यक्रम का संचालन किया। कृष्णा कर्तव्य, सहायक, नागरी लिपि परिषद ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का आरंभ नागरी लिपि की उपयोगिता और भारतीय भाषाओं के बीच उसके संपर्ककारी स्वरूप को रेखांकित करने वाली रचनाओं से हुआ। आस्ट्रेलिया के डॉ. सुभाष शर्मा ने नागरी लिपि के प्रति समर्पित कविता प्रस्तुत की। मेलबोर्न से डॉ. सुनीता शर्मा, स्पेन से मंजू यादव तथा लंदन से डॉ. इंदु बारीठ ने भी अपनी-अपनी रचनाओं के माध्यम से कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। मंजू यादव की रचना ‘हमार पड़ोसन’ में प्रवासी जीवन और स्त्री की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों को संवेदनशीलता के साथ उठाया गया। बर्मिंघम के डॉ. कृष्ण कन्हैया ने देशप्रेम और राष्ट्रध्वज पर मुक्तक प्रस्तुत किए। सूरीनाम से श्रीमती सांद्रा लुटावन गणेश ने ‘तिरंगा भारत की शान’ कविता के माध्यम से स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। मुख्य अतिथि बाबा कानपुरी ने अपनी विशिष्ट हास्य-व्यंग्य शैली तथा अवधी भाषा में काव्य-पाठ कर श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। वरिष्ठ कवि मोहन द्विवेदी ने हास्य-व्यंग्य की रचनाओं से कार्यक्रम में रोचकता प्रदान की। दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी मोहित कुमार ने ‘कलाकार’ कविता के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों को अभिव्यक्ति दी। जालौन, बुदेलखंड से जुड़े संजय सिंघल ने सामाजिक कुरीतियों और देशभक्ति से संबंधित मुक्तक प्रस्तुत किए। अमृतसर पंजाब के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. किरण खन्ना ने राष्ट्रचेतना पर आधारित कविता प्रस्तुत करने के साथ पंजाबी भाषा में धनीराम चात्रिक की ‘मौद्ध’ कविता का पाठ किया। रायपुर छत्तीसगढ़ की डॉ. अपराजिता शर्मा ने नागरी लिपि परिषद को समर्पित कविता तथा छत्तीसगढ़ी में भी लोककाव्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में अंजलि मिश्रा ने छत्तीसगढ़ी हलबी लोकगीत, कोलकाता की डॉ. शिप्रा मिश्रा ने भोजपुरी गीत तथा फिलाडेल्फिया अमेरिका की डॉ. मीरा सिंह ने भोजपुरी कविता प्रस्तुत की। मॉरीशस से डॉ. सोमदत्त काशीनाथ ने हिंदी के साथ फ्रेंच, क्रियोल, बांग्ला, भोजपुरी और तमिल में अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हुए नागरी लिपि की वैज्ञानिकता, उपयोगिता और वैश्विक स्वीकार्यता पर प्रकाश डाला। मुंबई की लता जोशी ने तिरंगे को समर्पित कविता प्रस्तुत की। बेंगलुरु से जुड़े डॉ. इस्माक अली ने नागरी लिपि परिषद की यात्रा और उसके भाषाई सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया। कच्छ गुजरात की डॉ. संगीता पाल ने लोकगीत कजरी, कानपुर के जितेंद्र कुमार पाल ने प्रेम और पीड़ा पर आधारित कविता तथा गाजियाबाद की डॉ. रश्मि चौबे ने सावन गीत प्रस्तुत किया। अमेरिका से जुड़े डॉ. अनंत कृष्णन ने तमिल और हिंदी में अपने विचार व्यक्त करते भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। लखनऊ से चिकित्सक डॉ. प्रवीण कुमार ने हास्य एवं स्वास्थ्य विषयक कुंडलियों का पाठ किया। मुजफ्फरपुर से डॉ. पंकज वासनी ने ‘आरक्षण होना ही चाहिए’ कविता के माध्यम से कन्या सुरक्षा, शिक्षा, सम्मान और समान गरिमा का संदेश दिया। डॉ. अजय कुमार ओझा ने भोजपुरी गीत प्रस्तुत किया, जबकि आथर्स गिल्ड आफ इंडिया के महासचिव डॉ. शिवशंकर अवस्थी ने बुंदेली लोकगीत ‘मोरी बाउ, कब बजे रामतुला’ के माध्यम से बुदेलखंड की लोकसंस्कृति की सजीव झलक प्रस्तुत की। कार्यक्रम के समापन चरण में संचालक राजेंद्र पाल ने नागरी लिपि को समर्पित अपनी कविता ‘नागरी की ज्योति जले’ प्रस्तुत की। कवि सम्मेलन का समाहार करते हुए नागरी लिपि परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल ने कहा कि नागरी लिपि का यह मंच केवल हिंदी का मंच नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं और बोलियों के सम्मान का मंच है। उन्होंने भाषाई विविधता को भारतीय संस्कृति की शक्ति बताते हुए विभिन्न भाषाओं में रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया। उन्होंने ब्रजभाषा में ‘कीकर की कांटी’ कविता सुनाई। अंत में नागरी लिपि परिषद के सहायक कृष्णा कर्तव्य ने सभी अतिथियों, कवियों, साहित्यकारों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। सम्मेलन ने भाषाई विविधता, साहित्यिक समन्वय और भारतीय भाषाओं के परस्पर संवाद का प्रभावी संदेश दिया। कार्यक्रम का समापन ‘जय नागरी, जय भारत’ के उद्घोष के साथ हुआ। -डॉ. हरिसिंह पाल
नागरी लिपि परिषद के 52वें स्थापना दिवस पर हुआ अंतरराष्ट्रीय सर्वभाषा नागरी लिपि कवि सम्मेलन
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