आज हमारा पाल/बघेल समाज वैचारिक और आर्थिक रूप से एक बड़े बदलाव की मांग कर रहा है। मंचों की राजनीति और झूठे दिखावे से हटकर हमें गणितीय, वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। समाज के वास्तविक उत्थान के लिए निम्नलिखित 5 स्तंभों पर तुरंत धरातल पर काम शुरू करना अनिवार्य है-
- सभी प्रकार के नशे पर पूर्ण पाबंदी : नशा किसी भी परिवार की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण है। समाज के सार्वजनिक कार्यक्रमों, शादियों और बैठकों में शराब, तंबाकू या किसी भी प्रकार के नशे के सेवन और परोसने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। युवाओं को नशे के दलदल से निकालने के लिए ग्राम और जिला स्तर पर विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
- आपसी मनमुटाव दूर करने हेतु ‘केंद्रीय समन्वय समिति’ की स्थापना : कोर्ट-कचहरी और पुलिस थानों के चक्कर में समाज का लाखों रुपया और मान-प्रतिष्ठा बर्बाद होती है। आपसी विवादों और मनमुटाव को घर-परिवार में ही सुलझाने के लिए एक ‘केंद्रीय सामाजिक विवाद निवारण केंद्र’ स्थापित हो, जहाँ समाज के निष्पक्ष प्रबुद्धजन बैठकर आपसी सहमति से फैसले कराएं।
- माता-पिता की जिम्मेदारी और बच्चों को उचित मार्गदर्शन : हर माता-पिता की यह पहली जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को केवल पढ़ाएं ही नहीं, बल्कि उन्हें नैतिक मूल्य और सामाजिक न्याय सिखाएं। परिवारों में बेटे और बेटी के बीच भेदभाव रहित आचरण हो। बच्चों के साथ बैठकर संवाद करें, ताकि वे गलत संगत में न पड़ें, माता-पिता स्वयं आचरण सुधारकर बच्चों के लिए एक मर्यादित और आदर्श रास्ता प्रशस्त करें।
- बच्चों का आज्ञाकारी व अनुशासित बनना : समाज के बच्चों और युवाओं का यह परम कर्तव्य है कि वे माता-पिता और बड़ों के प्रति जिम्मेदार बनें। पाश्चात्य संस्कृति और सोशल मीडिया के अंधानुकरण को छोड़कर अपनी शिक्षा, करियर और संस्कारों पर ध्यान केंद्रित करें। माता-पिता के संघर्षों का सम्मान करना ही सच्ची संतानों का धार्मिक संस्कार है।
- अतार्किक अनुष्ठान और महंगी शादियों पर कड़ा नियंत्रण : अंधविश्वास फैलाने वाले और भारी कर्ज में ढकेलने वाले अतार्किक धार्मिक कर्मकांडों को बंद कर उस धन को बच्चों की उच्च शिक्षा और व्यापार में लगाएं। शादियों में फिजूलखर्ची, प्री-वेडिंग शूट, डीजे और दिखावे पर पूरी तरह रोक लगे। समाज में सामूहिक आदर्श विवाह को प्राथमिकता दी जाए ताकि गरीब और अमीर का फासला खत्म हो और वित्तीय अनुशासन मजबूत बने।
महत्वपूर्ण : अगर कभी दान करने की इच्छा हो, दान अपनों के ही बीच करें, चाहे उसमें आपके नाते-रिश्तेदार, परिवार और पारिवारिक भी हो सकते हैं जो हमेशा आपको याद रखेंगे। अंतत: जब जीना-मरना अपनों के बीच में ही होना है, तो क्यों न समाज के लिए हमेशा सकारात्मक रहें।
आह्वान : आइए, राजनीतिक चश्मा उतारकर शुद्ध रूप से समाजहित में एकजुट हों। जब तक हम अपने परिवार और समाज के नियमों को धरातल पर कड़ा नहीं करेंगे, तब तक समाज में बदलाव संभव नहीं है। पूर्णरूप से समाजहित में जारी, एक बार अवश्य ध्यान दें।
-नरेश कुमार पाल, मेरठ
मो. 9997326200