कभी पलकों पे आंसू थे,
कभी सीने में हसरत थी।
मगर ए जिन्दगी फिर भी
हमें तुझसे मोहब्बत थी।
वफा के नाम पर अक्सर
शिकायत वो भी करते हैं
तजुर्बा बेवफाई का हमेशा
जिनकी फितरत थी।
बहुत मगरुर थे हम भी
तुम्हारे नाम पर लेकिन
मुकद्दर की लकीरों में
कहां अपनी मोहब्बत थी।
नहीं सीखा झुकाना सर
कभी हमने जमाने में
यही अपनी नाकामी थी
गलत शायद ये आदत थी।
कभी पलकों पे आंसू थे,
कभी सीने में हसरत थी।
मगर ए जिन्दगी फिर भी
हमें तुझसे मोहब्बत थी।
-डॉ. अमर पाल
ब्यूरो चीफ, लुधियाना
मो. 9888100609
जिन्दगी से मोहब्बत!
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