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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

सबक सिखाती हैं प्राकृतिक आपदाएँ!

सबक सिखाती हैं प्राकृतिक आपदाएँ!
संतुलन में सृष्टि रहे, वही सीख अपनाएँ!
सांस्कृतिक कर्तव्य डगमगाने लगा है
धार्मिक विषयों में अंतर आने लगा है
कट्टरवाद विचारों की भी हों सीमाएँ!
संतुलन में सृष्टि रहे, वही सीख अपनाएँ!!
बारिश में अब पर्वत, खूब धसकने लगे
सैलाबों के अजगर, गाँव गटकने लगे
खेती बस्ती डूबने की हों घटनाएँ!
संतुलन में सृष्टि रहे, वही सीख अपनाएँ!!
जल-भराव कर देते, ग्लेशियर पिघलकर
झीलें बन जातीं अचानक, जमीं सिमटकर
जलवायु परिवर्तन की लाएँ विपदाएँ!
संतुलन में सृष्टि रहे, वही सीख अपनाएँ!!
न काटें जंगल, न उद्योगों को छूट दें
भू जल हवा गगन अपनी शुद्धता न तज दें
प्राकृतिक संसाधनों को न चिढ़ाएँ!
संतुलन में सृष्टि रहे, वही सीख अपनाएँ!!
भू जल हवा गगन को भी संरक्षण दीजे
भू जल हवा बचाकर, स्वयं का रक्षण कीजे
हर आपदा चेतावनी है, अब चेत भी जाएँ!
संतुलन में सृष्टि रहे, वही सीख अपनाएँ!!
अगर प्रकृति को निचोड़ा जाए जम के
ऐसा ही है खू़न बह गया सारा तन से
पथराए दो नैनों में, अब जल छलकाएँ!
संतुलन में सृष्टि रहे, वही सीख अपनाएँ!!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985

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