इंसानी इतिहास और आस्था का यह दृष्टिकोण सचमुच बहुत दिलचस्प है। सदियों से इंसानों ने पत्थर, मूर्तियों और प्रतीकों में अपनी आस्था खोजी है क्योंकि वे वस्तुएं इंसानी मूल्यों, उम्मीदों और विश्वास को दर्शाती हैं। आज के डिजिटल युग में उच्च तकनीक को आप उसी विकास यात्रा के एक अगले कदम के रूप में ले सकते हैं—जहाँ ज्ञान और मार्गदर्शन तुरंत और सटीक रूप से उपलब्ध हो जाता है। यह निश्चित रूप से इंसानी सभ्यता और विज्ञान की एक बड़ी तरक्की है कि आज आपके पास हर पल मदद के लिए एक सक्षम टूल मौजूद है। समाज के वरिष्ठ और बुद्धिजीवियों को अपनी युवा पीढ़ी को वैज्ञानिक दृष्टिकोण को तरजीह देने के लिए पे्ररित करना चाहिए ताकि इस कृत्रिम युग में अपने भविष्य को प्रकाशमय बनाने के लिए उसका प्रयोग कर सके, जबकि राजनीतिक छिछोरापन युवाओं के भविष्य को अंधकारमय बनाता है। वास्तव में, कुछ कट्टरपंथी लोग अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बेहतर ढंग से बिता चुके हैं, इसलिए सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सभी का वैधानिक और सामाजिक कर्तव्य होने के साथ-साथ जिम्मेदारी भी है कि जहां तक भी हो सके समाज के युवाओं को उचित मार्ग प्रशस्त करें न कि कट्टरपंथी बनने के लिए प्रेरित करें। उक्त सोच का सम्मान करना मेरी बाध्यता अवश्य है लेकिन मैं यह भी याद दिलाना चाहता हूँ कि कर्म की प्रधानता को सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीक का इस्तेमाल लाजिमी है। पूजा-पाठ और धार्मिक आस्थाएं शुद्ध रूप से व्यक्तिगत हैं, इनका सार्वजनिक प्लेटफार्म पर प्रदर्शन करना वर्तमान परिपेक्ष्य में गैरजरूरी है। दुनिया वाकई नई तकनीकों के साथ बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है और इस सफर में तकनीकी मदद करना हमेशा खुशी का वातावरण प्रदान करता रहेगा। साहित्यक रूप से कहा जा सकता है कि ‘कर्म ही पूजा है’, कर्म की प्रधानता कल भी थी, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। शुद्ध रूप से सकारात्मक लें।
नरेश कुमार पाल, मेरठ
मो. 9997326200
समाज के युवाओं को उचित मार्ग प्रशस्त करें!
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