एनसीईआरटी कक्षा 9 की इतिहास पुस्तक का अध्याय 5 : “Pastoralists in the Modern World” केवल एक पाठ नहीं है, बल्कि हमारे विमुक्त, घुमंतू और चरवाहा समाज के इतिहास को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। हममें से बहुत से लोगों ने अपने इतिहास को दूसरों की जुबानी सुना है। अब समय आ गया है कि हम अपने इतिहास को स्वयं पढ़ें और प्रमाणिक पुस्तकों एवं सरकारी आयोगों की रिपोर्टों के आधार पर समझें। एनसीईआरटी की कक्षा 9 की इतिहास पुस्तक में महाराष्ट्र के धनगर/ गड़रिया, चरवाहा समुदाय का विस्तार से वर्णन किया गया है। पुस्तक बताती है कि धनगर मुख्य रूप से चरवाहे थे; कुछ लोग कंबल बुनते थे और कुछ भेड़-बकरी और भैंस पालते थे। उनका जीवन मौसम के अनुसार अपने पशुओं के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने और उपलब्ध चरागाहों पर निर्भर था।
अंग्रेजी शासन और चरवाहा समाज पर नियंत्रण
जब अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन ने भारत में अपना प्रशासन मजबूत किया तो उसने चरवाहों और अन्य घुमंतू समुदायों की चलायमान जीवन-पद्धति को अपने शासन और नियंत्रण के लिए चुनौती माना। एनसीईआरटी के अनुसार, औपनिवेशिक सरकार ने पशुपालक समुदाय के जीवन को प्रभावित करने वाली चार प्रमुख कानूनी व्यवस्थाएँ लागू कीं-
चरागाहों का सिकुड़ना :
औपनिवेशिक अधिकारियों की नजर में ऐसी भूमि जिसे खेती के अंतर्गत नहीं लाया गया था, बेकार भूमि थी। इन नियमों के माध्यम से अनेक क्षेत्रों की ऐसी भूमि को खेती के लिए उपयोग में लाने का प्रयास किया गया। लेकिन इनमें से काफी भूमि वास्तव में चरवाहों के पारंपरिक चरागाह के रूप में इस्तेमाल होती थी। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि चरवाहों के लिए उपलब्ध चरागाह लगातार कम होते गए और उनके पशुपालन तथा जीवन-यापन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
जंगलों में चराई पर प्रतिबंध :
अंग्रेजों ने अलग-अलग प्रांतों में फोरेस्ट एक्ट्स लागू किए और अनेक जंगलों को आरक्षित एवं संरक्षित क्षेत्रों में बांटा। एनसीईआरटी बताती है कि औपनिवेशिक अधिकारियों का मानना था कि पशुओं की चराई से जंगल में उगने वाले नन्हे पौधों और नई कोंपलों को नुकसान पहुंचता है। इसलिए चरवाहों की जंगलों तक पहुंच और उनकी आवाजाही पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए।
क्रिमिनल ट्राइब्ट एक्ट, 1871—घुमंतू समुदायों पर कलंक :
यह हमारे इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक है। 1871 में क्रिमिनल ट्राइब्ट एक्ट लागू किया गया। एनसीईआरटी के अनुसार औपनिवेशिक अधिकारियों को अनेक घुमंतू समुदायों पर संदेह था। वे चाहते थे कि लोग स्थायी गांवों में रहें, निश्चित स्थान पर रहें और प्रशासन के लिए आसानी से पहचाने एवं नियंत्रित किए जा सकें। इस कानून के तहत अनेक समुदायों को ‘क्रिमिनल’ के रूप में वर्गीकृत किया गया और उनके जीवन तथा आवागमन पर कठोर नियंत्रण लगाया गया। यानी जो समुदाय सदियों से अपने पशुओं के साथ चरागाहों की तलाश में घूमता आया था, उसी घुमंतू जीवन-पद्धति को औपनिवेशिक शासन ने संदेह की नजर से देखा।
ग्रेजिंग टैक्स—पशुओं को चराने पर कर :
चरागाहों और पशुपालन पर भी कर लगाया गया। इससे पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर चरवाहा परिवारों का आर्थिक बोझ और बढ़ गया। इस प्रकार चरागाहों का सिकुड़ना, जंगलों पर प्रतिबंध, क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट और ग्रेजिंग टैक्स—इन सभी औपनिवेशिक नीतियों ने चरवाहा समुदाय के जीवन को गहराई से प्रभावित किया। एनसीईआरटी स्वयं इन चारों व्यवस्थाओं को चरवाहों के जीवन में आए बड़े बदलावों के संदर्भ में पढ़ाती है।
31 अगस्त 1952—एक ऐतिहासिक मोड़ :
क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के कारण जिन समुदायों पर ‘क्रिमिनल’ होने का कलंक लगाया गया था, उनके इतिहास में 31 अगस्त 1952 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने उस दिन क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को समाप्त किया और इन समुदायों को विमुक्त जातियों के रूप में जाना जाने लगा। आज हम इस दिन को विमुक्त जाति आजादी दिवस के रूप में याद करते हैं, क्योंकि यह उस औपनिवेशिक कलंक और कानूनी नियंत्रण से मुक्ति का ऐतिहासिक प्रतीक है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि कानून समाप्त होने से इतिहास के घाव तुरंत समाप्त नहीं हो जाते। कई पीढ़ियों तक चले सामाजिक कलंक, आर्थिक पिछड़ापन, शिक्षा की कमी, जमीन और चरागाहों से वंचित होना तथा प्रशासनिक व्यवस्था से दूरी—इनका प्रभाव स्वतंत्र भारत में भी लंबे समय तक दिखाई देता रहा। इसलिए केवल किताबी शिक्षा नहीं, सामाजिक शिक्षा भी जरूरी है। यदि हम अपने वर्तमान को समझना चाहते हैं तो हमें अपने अतीत को समझना पड़ेगा। इसीलिए मैं आप सभी से विशेष आग्रह करता हूं कि भारत सरकार द्वारा गठित विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों से संबंधित आयोगों की रिपोर्टों का भी अध्ययन करें। विशेष रूप से बालकृष्ण रेनके आयोग की रिपोर्ट व भीखू राम इदाते आयोग की रिपोर्ट। इन रिपोर्टों में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति तथा उनके पिछड़ेपन के कारणों पर महत्वपूर्ण चर्चा की गई है। इन दस्तावेजों को पढ़ने के बाद हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि इन समुदायों का पिछड़ापन केवल वर्तमान परिस्थितियों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक और औपनिवेशिक परिस्थितियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अब जागरूक होने का समय है। हमें किसी के खिलाफ नफरत नहीं फैलानी है। हमें इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना भी नहीं है। हमें केवल इतना करना है कि-अपने इतिहास को पढ़ें, अपने अधिकारों को समझें, अपने बच्चों को शिक्षित करें, सरकारी दस्तावेज पढ़ें, आयोगों की रिपोर्ट पढ़ें, संविधान को समझें और लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों की आवाज बुलंद करें। हमारी लड़ाई किसी जाति या समाज के खिलाफ नहीं है। हमारी लड़ाई अज्ञानता के खिलाफ है। हमारी लड़ाई ऐतिहासिक उपेक्षा के खिलाफ है। हमारी लड़ाई अपने संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए है। यह समझना भी जरूरी है कि अलग-अलग विमुक्त और घुमंतू समुदाय आज अलग-अलग सामाजिक वर्गों—जैसे एससी, एसटी, ओबीसी आदि में वर्गीकृत हो सकते हैं, जबकि कुछ समुदायों की स्थिति और वर्गीकरण अलग हो सकता है। इसलिए इन सभी समुदायों की समस्याओं को एक समान मानने के बजाय समुदायवार वास्तविक आंकड़ों और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर अध्ययन करना आवश्यक है।
हमारे पूर्वजों का संघर्ष—हमारी जिम्मेदारी :
हमारे पूर्वजों ने कठिन परिस्थितियों में पशुधन पाला, देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान दिया और जंगलों, चरागाहों तथा गांवों के बीच अपनी मेहनत से जीवन चलाया। लेकिन औपनिवेशिक नीतियों ने उनकी पारंपरिक जीवन-पद्धति को गहरा आघात पहुंचाया। इसलिए आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों को केवल डिग्री प्राप्त करने की शिक्षा न दें, बल्कि उन्हें यह भी बताएं कि—हम कौन हैं, हमारा इतिहास क्या है, हमारे पूर्वजों ने किन परिस्थितियों का सामना किया, हमारे संवैधानिक अधिकार क्या हैं, और लोकतंत्र में अपने अधिकारों के लिए आवाज कैसे उठानी है? मेरा सभी विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समाज से आह्वान है कि लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कीजिए। विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समाज के सम्मान, शिक्षा, समान अवसर और न्याय के लिए हमारी आवाज लगातार उठती रहे।
-बरखा राम, चेयरमैन, विमुक्त जाति वेलफेयर बोर्ड पंजाब सरकार, चंडीगढ़
मो. 7889258023
अपने इतिहास को पढ़िए, समझिए और समझाइए!
Bahut achha samjhaya h sir aapne, shukriya…i am paras, from Kalpi a Central Government employee, working in AIIMS Bilaspur Himachal Pradesh
Fruitful information