सरकारी अस्पताल के बरामदे में करीब साठ-पैंसठ साल की एक बुढ़िया बड़ी ही बेचैनी से टहल रही थी, पर उसका सारा ध्यान प्रसव गृह के दरवाजे की तरफ ही था। भीतर से जब भी प्रसूता की चीख सुनाई देती तो वह बुढ़िया बड़बड़ाने लगती। तभी प्रसव गृह का दरवाजा खुला। एक नर्स बाहर आई। मुस्कुराते हुए बोली-‘दादी जी बधाई हो, लड़की हुई है।’ ‘लड़की हुई है’… कहते हुए बुढ़िया का चेहरा उतर गया। बुढ़िया पास में पड़ी बेंच पर बैठ गई। तभी उसका लड़का आ गया, जो बाजार गया था, कुछ जरूरी सामान लेने। अपनी मां को मायूस बैठा देख वह समझ गया कि इस बार भी लड़की हुई है। तभी बुढ़िया बुदबुदायी-‘बेटा इस बार भी वंश आगे न बढ़ पाया। यह चौथी कलमुंही पैदा हो गई…।’
-मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
गॉव-रिहावली, डाक-तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा-283111
मो. 9627912535
लघुकथा-वंश…
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