जब हम भारतीय राजनीति और खासकर उत्तर प्रदेश की राजनीति का विश्लेषण करते हैं तो हम यही पाते हैं कि जितने भी पिछड़े वर्ग के सामाजिक नेता हैं चाहे वह यादव समाज के हों, गडरिया पाल समाज के हों अथवा कुशवाहा पटेल समाज के हों, इन सभी समाजों के लोगों को सभी राजनीतिक पार्टियां अपना पदाधिकारी बना देती हैं और इसका पूरा फायदा सवर्ण समाज को चला जाता है। यही आगामी चुनाव में होने वाला है। यहां पर हमारे पाल समाज के राजनीतिक दल राष्ट्रीय समाज पार्टी, राष्ट्र उदय पार्टी आदि केवल अपना टैग ही लगाने के लिए बच जाते हैं। समाज के लोगों का अनेक राजनीतिक दलों में बंट जाना न केवल हमारे समाज के लिए बल्कि पूरी भारतीय राजनीति के लिए सवर्ण समाज को ही मजबूती प्रदान करने के लिए होता है क्योंकि पिछड़ा वर्ग के लोग जातियों में विभक्त हैं और जातियां फिरकों में बंट गई हैं। वर्तमान शासन में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा शोषण, हत्या, बलात्कार की घटनाएं गडरिया पाल समाज के लोगों के साथ हुई हैं। गडरिया पाल समाज को विघटन से बचकर संगठित होने का प्रयास करना होगा। विघटन के कारण ही धनगर आरक्षण का मामला आज तक न्यायालय में लंबित है। धनगर समाज के लोग आज भी सर्टिफिकेट के लिए भटक रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मथुरा, लखनऊ, आगरा जैसे क्षेत्रों में कई वर्षों से धनगर समाज के लोग सर्टिफिकेट के लिए आंदोलन कर रहे हैं लेकिन परिणाम शून्य है। इसका मूल कारण है समाज का विभिन्न राजनीतिक दलों में विभाजित होना। यह बड़ी ही दुखद बात है कि जब भी समाज के लोग किसी पार्टी के प्रमुख बनते हैं, विधायक बन जाते हैं, सांसद बन जाते हैं, मंत्री बन जाते हैं, तो ऐसे लोग समाज को हाशिए पर डालकर केवल और केवल पार्टी के लिए काम करते हैं। राजनीतिक दल तो यही चाहते हैं कि कोई भी समाज का व्यक्ति राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तर पर अपने समाज को संगठित ना कर पाए। समाज टुकड़े-टुकड़े मे बंटा रहेगा तो राजनीतिक दल को ही फायदा होगा। यह बात समाज के पदाधिकारियों और युवा वर्ग को गंभीरतापूर्वक समझनी चाहिए। समय नहीं है, लड़खड़ा कर चलने का। अभी भी संभल जाओ, अभी वक्त है संभलने का।।
-नारायण प्रसाद पाली
प्रांतीय प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़
मो. 9575761235
पिछड़े वर्ग को सामाजिक विघटन से बचना होगा!
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