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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

अंधविश्वास की गहरी धुंध हमारे नौनिहालों और युवाओं के भविष्य को निगल रही है!

​आस्था और आडंबर के बीच का अंतर धुंधला हो चुका है। अंधविश्वास की गहरी धुंध हमारे नौनिहालों और युवाओं के भविष्य को निगल रही है। जिस उम्र में हाथ में किताबें, कलम और तकनीक होनी चाहिए थी, उस उम्र में हमारे बच्चों और नौजवानों को धर्म के नाम पर सड़कों पर झोंका जा रहा है। ​नेता अपनी राजनीति की रोटियां सेक रहे हैं और वोट बैंक की खातिर धर्म की आड़ लेकर पूरे समाज के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। राजनेताओं के अपने बच्चे देश-विदेश के सबसे महंगे और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में पढ़कर ऊंचे पदों पर बैठेंगे और आम जनता के बच्चों को अंधविश्वास के अंधेरे में धकेलकर सड़कों पर भीड़ बनाने के काम में लाया जा रहा है।
​कटु सत्य जो हर अभिभावक और युवा को समझना होगा : ​कुर्सी पढ़ाई से मिलती है, अंधविश्वास से नहीं। कोई भी प्रशासनिक पद, डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक की डिग्री किसी धार्मिक यात्रा या शारीरिक कष्ट से नहीं मिलती। इसके लिए रात-दिन मेहनत, पढ़ाई और तर्कसंगत सोच की जरूरत होती है।
​राजनीतिक इस्तेमाल से बचें : नेता कभी नहीं चाहेंगे कि आम समाज का बच्चा पढ़-लिखकर सवाल पूछने लायक बने। वे चाहते हैं कि युवा तर्कहीन रहें ताकि उन्हें आसानी से धर्म और भावना के नाम पर इस्तेमाल किया जा सके।
बच्चों का असली मंदिर स्कूल और कॉलेज है : नौनिहालों का भविष्य मंदिर-मस्जिद या धार्मिक जुलूसों से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से संवरेगा। ​जागो नौजवानों, अपने बच्चों की दिशा बदलो! ​यदि हम अब भी नहीं जागे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगी। धर्म व्यक्ति का निजी विश्वास हो सकता है, लेकिन शिक्षा जीवन की अनिवार्य शर्त है। ​अपने बच्चों को अंधविश्वास के अंधेरे से निकालिए। उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण दीजिए, उनके हाथों में किताबें थमाइए और उन्हें स्कूल-कॉलेज भेजिए। ​याद रखिए—तकदीर कावड़ या कोई बोझ उठाने से नहीं, बल्कि शिक्षा और मेहनत की कलम से लिखी जाती है!
​नोट : इस पोस्ट का उद्देश्य किसी की आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि केवल शिक्षा और सजगता का संदेश देना है। यदि जाने-अनजाने में किसी की भावनाएं आहत हुई हों तो मैं क्षमा चाहता हूँ।
राजेश कुमार पाल, इंदौर
बीमा वाला एवं सामाजिक चिंतक
मो. 9424831940

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