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धनगर समाज और एसटी की मांग : कितनी उचित?

कल्पना कीजिए-एक व्यक्ति अपनी जाति का प्रमाणपत्र बनवाने सरकारी कार्यालय जाता है। उसके सामने पुराने राजस्व रिकॉर्ड खुलते हैं। कहीं एक नाम मिलता है, कहीं उससे मिलता-जुलता दूसरा नाम। दस्तावेजों की व्याख्या होती है, प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है और अंतत: मामला अदालत तक पहुँच जाता है। यहीं से एक साधारण दिखाई देने वाला प्रश्न धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक विवाद का रूप ले लेता है- क्या ‘धनगर’ और ‘धनगड’ एक ही समुदाय हैं? महाराष्ट्र में धनगर समाज की एसटी मांग को समझने के लिए इस प्रश्न की पृष्ठभूमि समझना आवश्यक है। एसटी सूची में धनगड नाम और महाराष्ट्र के धनगर समाज की पहचान के बीच लंबे समय से विवाद और दावे रहे हैं। धनगर समाज का एक पक्ष मानता है कि दोनों एक ही समुदाय से संबंधित हैं और नाम अथवा वर्तनी के कारण धनगर समाज एसटी के अधिकार से वंचित रहा है क्योंकि धनगर समाज ओबीसी में आता है और धनगड समाज एसटी में। लेकिन संवैधानिक अधिकार केवल समान सुनाई देने वाले नामों से तय नहीं होते, इसके लिए इतिहास, सरकारी रिकॉर्ड, प्रमाण और संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। धनगर या गड़रिया से जुड़े समुदायों की सरकारी श्रेणी अलग-अलग राज्यों में अलग है, लेकिन यह कहना कि ‘पूरे भारत का गड़रिया समाज एक ही सरकारी जाति है और हर जगह ओबीसी से एसटी में जाना चाहिए’ तथ्यात्मक रूप से बहुत सरल निष्कर्ष होगा। उदाहरण के लिए, एनसीबीसी की सूचियों में छत्तीसगढ़ में गड़रिया, धनगर ओबीसी सूची में हैं, जबकि दिल्ली की ओबीसी सूची में भी गड़रिया, पाल, बघेल, धनगर आदि दर्ज हैं। मध्य प्रदेश के संबंध में एनसीबीसी के दस्तावेजों में धनगर, गडेरी, गड़ेरिया आदि नाम ओबीसी संदर्भ में मिलते हैं। वहीं दूसरी ओर अलग राज्यों में समान मिलते-जुलते नामों की सरकारी श्रेणी अलग हो सकती है। इसलिए केवल नाम या पारंपरिक पेशे की समानता से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि सभी समुदाय कानूनी रूप से एक ही जाति हैं। गड़रिया, धनगर, पाल आदि नाम कई क्षेत्रों में परस्पर जुड़े हुए सामाजिक संदर्भ में मिलते हैं। इनमे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समानताएँ हो सकती हैं। आरक्षण की श्रेणी राज्य और संबंधित संवैधानिक सूची के अनुसार तय होती है। इसलिए एक राज्य में ओबीसी में दर्ज समुदाय दूसरे राज्य में उसी नाम से उसी श्रेणी में हो, यह जरूरी नहीं। जब अलग-अलग राज्यों में समान या संबंधित समुदाय अलग-अलग श्रेणियों में दिखाई देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से ‘एक समान सामाजिक पहचान, अलग-अलग सरकारी स्थिति’ का प्रश्न उठता है। लेकिन समान सामाजिक नाम का अर्थ अपने-आप समान संवैधानिक समुदाय नहीं होता। इसलिए पहला प्रश्न यही होना चाहिए-क्या हमने इस आंदोलन की जड़ को पूरी तरह समझा है या हम केवल उसके अंतिम परिणाम-एसटी का दर्जा की मांग कर रहे हैं? क्योंकि किसी भी अधिकार की मांग की सबसे मजबूत नींव तथ्य और प्रमाण होते हैं। लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है मान लीजिए यह विवाद समाप्त हो जाता है और धनगर समाज को एसटी का दर्जा मिल जाता है। फिर क्या? क्या गरीबी समाप्त हो जाएगी? क्या बेरोजगारी समाप्त हो जाएगी? क्या हर बच्चा उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाएगा? क्या हर युवा सरकारी नौकरी पा जाएगा? क्या समाज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाएगा? निश्चित रूप से नहीं। आरक्षण अवसर दे सकता है, लेकिन अवसर का उपयोग करने के लिए शिक्षा, योग्यता, मेहनत और आर्थिक क्षमता भी चाहिए। इसलिए हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि-‘एसटी में क्या मिलेगा?’ बल्कि यह भी पूछना चाहिए- ‘एसटी में जाने के बाद क्या बदलेगा और क्या बदलने का जोखिम है?’ यहीं से मेरी व्यक्तिगत सोच इस आंदोलन से अलग होती है। मेरी व्यक्तिगत राय में धनगर समाज को ओबीसी से एसटी में परिवर्तन के पक्ष में जाने से पहले बहुत गंभीरता से विचार करना चाहिए। मैं किसी एसटी समाज को कमतर नहीं मानता। एसटी होना कोई अपमान नहीं है। अनुसूचित जनजातियाँ हमारे देश की महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत हैं और उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन किसी दूसरे समाज का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि हम अपने समाज के भविष्य से जुड़े कठिन प्रश्न पूछना छोड़ दें। मेरा प्रश्न है-क्या केवल आरक्षण के अतिरिक्त लाभ के लिए हमें अपनी वर्तमान सामाजिक पहचान बदलनी चाहिए? भारत में जाति व्यवस्था और सामाजिक धारणाएँ अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। सरकारी श्रेणियाँ भी कई बार सामाजिक पहचान को प्रभावित करती हैं। इसलिए ओबीसी से एसटी में जाने के बाद धनगर समाज की सामाजिक पहचान और सामाजिक प्रतिष्ठा पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस प्रश्न को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। मैं यह नहीं कह रहा कि एसटी होने से प्रतिष्ठा कम हो जाती है। मेरा प्रश्न केवल इतना है कि-क्या हमारी वर्तमान सामाजिक स्थिति की तुलना में परिवर्तन के बाद समाज हमें उसी दृष्टि से देखेगा? यदि इसका उत्तर निश्चित नहीं है, तो इतने बड़े परिवर्तन से पहले व्यापक सामाजिक अध्ययन क्यों न किया जाए? इस विषय पर मेरी सोच केवल किताबों या भाषणों से नहीं बनी है। मैं स्वयं ओबीसी वर्ग से आता हूँ। एक समय मैंने आरक्षण का लाभ लेने के लिए ओबीसी जाति प्रमाणपत्र बनवाने का प्रयास किया था। लेकिन छत्तीसगढ़ में सेटलमेंट से संबंधित दस्तावेजी समस्या के कारण मेरा प्रमाणपत्र नहीं बन पाया। उसी समय से मैंने व्यक्तिगत रूप से आरक्षण का लाभ न लेने का निर्णय लिया। यह मेरा निजी निर्णय है। मैं यह नहीं कहता कि जो व्यक्ति संविधान के अनुसार आरक्षण का पात्र है, वह उसका लाभ न ले। आरक्षण संवैधानिक व्यवस्था है और पात्र व्यक्ति को उसका लाभ लेने का अधिकार है। लेकिन मेरे अनुभव ने मुझे एक बात जरूर सिखाई-व्यक्ति की स्थायी ताकत किसी प्रमाणपत्र से अधिक उसकी शिक्षा, योग्यता, मेहनत और आत्मनिर्भरता में होती है। इसी अनुभव से मेरे मन में आज यह प्रश्न उठता है-यदि हम अपने समाज को शिक्षा और आर्थिक शक्ति के माध्यम से मजबूत कर सकते हैं, तो क्या केवल आरक्षण की नई श्रेणी को ही हमारी प्रगति का मुख्य रास्ता मानना उचित है? ओबीसी में रहकर क्या हम मजबूत नहीं हो सकते? यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि हमारी समस्याएँ शिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और अवसरों की कमी हैं, तो हमें ओबीसी में रहते हुए अपने अधिकारों को मजबूत करने की लड़ाई क्यों नहीं लड़नी चाहिए? हमें सरकार से मांग करनी चाहिए- गरीब विद्यार्थियों के लिए बेहतर शिक्षा और छात्रवृत्ति, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, युवाओं के लिए कौशल विकास, रोजगार और स्वरोजगार के अवसर, पशुपालकों और किसानों के लिए प्रभावी योजनाएँ, छोटे व्यवसायों के लिए आर्थिक सहायता और समाज के लिए बेहतर राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिनिधित्व। समस्या यदि अवसरों की है तो अवसर बढ़ाइए; केवल श्रेणी बदलना ही समाधान क्यों हो? मैं धनगर समाज के ओबीसी से एसटी में परिवर्तन के पक्ष में नहीं हूँ। मेरी असहमति किसी एसटी समाज से नहीं है। मेरी असहमति उस सोच से है जिसमें किसी समाज की प्रगति का मुख्य रास्ता केवल उसकी आरक्षण श्रेणी बदलना मान लिया जाए। इसलिए मेरा प्रश्न अब भी वही है-क्या हमें अपने समाज की सरकारी श्रेणी बदलने की चिंता अधिक करनी चाहिए या अपने समाज की वास्तविक स्थिति बदलने की? हमें किसी समाज से ऊपर नहीं उठना है, किसी समाज को नीचा नहीं दिखाना है, हमें केवल अपने समाज को ऊपर उठाना है। आरक्षण मिले या न मिले, हमारी शिक्षा रुकनी नहीं चाहिए। सरकारी सहायता मिले या न मिले, हमारी मेहनत रुकनी नहीं चाहिए। व्यवस्था हमारे पक्ष में हो या न हो, हमारी आत्मनिर्भरता रुकनी नहीं चाहिए। क्योंकि किसी समाज की सबसे बड़ी जीत यह नहीं कि उसे कौन-सी श्रेणी मिली, सबसे बड़ी जीत यह है कि उसकी आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान साबित करने के लिए किसी श्रेणी का सहारा न लेना पड़े।
-सतेंद्र पाल, टीचर और लेखक
दहेजवार, बलरामपुर (छत्तीसगढ़)
संस्थापक-येन क्लासेस
मो. 7489159834

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