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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

अपनों का दर्द…

सिपाही चमन लाल का मोबाइल फोन बज उठा, शायद उसकी माँ बोल रही थी, दु:खी और घबराई हुई। ‘हल्लो-हल्लो… हाँ माँ क्या बात है? क्या हुआ?’ ‘बेटा! तुम जल्दी छुट्टी लेकर आ जाओ तुम्हारे पिताजी हॉस्पीटल में हैं’ फफक-फफक कर रोते हुए…बस इतना ही बोल पाईं बेचारी सावित्री। इतना सुन चमन लाल दौड़ता-हांफता हॉस्पीटल पहुंचा। अपने पिता की हालत देख चमन लाल चीख पड़ा- ‘किसने…किसने! मारा पिताजी को माँ…हा-हा पिताजी’…सफेद पट्टियों से पैक पूरे जिस्म को देख चमन लाल अपना आपा खो बैठा और धड़ाम से फर्श पर पसर गया। ‘बाजार गए थे सामान लेने, वहाँ किसान भूख हड़ताल किए अनशन पर बैठे थे कि तभी पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज कर दिया और किसानों की भीड़ में तुम्हारे पिताजी फंस गये। एक शराबी कांस्टेबल ने पीट-पीट कर यह हालत बना दी है तुम्हारे पिताजी की…!’ यह घटनाक्रम सुनते ही चमन लाल दंग रह गया। कल रात उसने भी तो पूरे जोश और जुनून से उन्हीं किसानों को पीटा था। उसे क्या पता था कि उसी भीड़ में उसके पिता उसके किसी साथी के हाथों सरकारी डंडे खा रहे थे। आज उसे पता चला कि ठीक इसी तरह न जाने कितने बूढेÞ बाप घायल-मरणासन्न पडेÞ-पड़े तड़प रहे होंगे, कितनों के पास अस्पताल जाने तक के पैसे न होंगे। हमें तो ऊपर से आॅर्डर मिला और हमने अपनों को ही पीट डाला। चमन लाल महसूस कर रहा था अपनों का दर्द।
-मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
गॉव-रिहावली, डाक-तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा-283111
मो. 9627912535

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