पत्थरों की छाती पर गर
धमक से पांव रख दूं
तो जमीं दरक जाती है
कभी बायें कभी दायें
थोड़ी सी सरक जाती है।
वह जड़ नहीं चैतन्य है,
पेड़ की जड़ सी निरत
अभेद पोषण के लिए
जमीं में धंस जाती है।
मैं चिन्मय सतत चैतन्य हूं,
सगुण स्वरूप साकार हूं।
तथापि निर्वेद-सवेद के लिए
सदा निपट निराकार हूं।
पल्लवित पुष्पित फलित हूं,
अपना सर्वस्व देकर भी
देखो दमित दैन्य दलित हूं।
असीम आंचल की छांव तले
केवल तू ही तो नहीं!
सारी सृष्टि शरणागत।
अरे तू! पलने वाले कृतघ्न!
मूढ़ मेरे आंचल से न खेल।
सुखन-ऐ-शाख पर बैठी
बेसुध वलाका तो नहीं।
जिसे तुम भस्म कर दो
सृष्टि हूं दृष्टा-दृष्टि हूं मैं।
आ बैठ मेरे पास तोषा तो कर
शांत हो सांस ले भरोसा तो कर।।
प्रो. रामगोपाल सिंह बघेल
-प्रो. राम गोपाल सिंह बघेल
प्राचार्य, जवाहरलाल नेहरू राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, श्री विजय पुरम
मो. 9933224460
मातृशक्ति…
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