जिस टहनी पर खुद बैठा है,
काटे क्यों नादान उसे!!
भूल गया अस्तित्व स्वयं का,
इतना है अभिमान तुझे!!
आज समंदर भी पछताए,
जीवन को बानी देकर
खेतों में उर्वरता,
जन-जन को दाना-पानी देकर
नदियाँ रोकर कहतीं प्रियतम,
मानव कहता शान इसे!
जिस टहनी पर खुद बैठा है,
काटे क्यों नादान उसे!!
निज दिल सा बहुमिश्रित समझा,
मेरी लहरों के जल को
प्रदूषित कर-करके हमको,
डसता आने वाले कल को
प्लास्टिक, फैक्ट्री, गटर विषैले,
करवाते रसपान मुझे!
जिस टहनी पर खुद बैठा है,
काटे क्यों नादान उसे!!
दुनियाभर के नेता जानें,
कल का दिन है कठिन बड़ा
सरहद के विवाद मिटाओ,
प्रदूषण एक युद्ध बड़ा
फैलेंगे रोगाणु, कीटाणु,
खा जाएंगे विद्वान तुझे!
जिस टहनी पर खुद बैठा है,
काटे क्यों नादान उसे!!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
जिस टहनी पर खुद बैठा है!
0
0
votes
Article Rating
Subscribe
Login
0 Comments
Oldest
Newest
Most Voted