इस महान देश की नियति तो देखिए। जनता, नेताओं की अंधभक्ति में डूबी है और जिन माननीयों को चुनाव में जीत दिलाकर विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है, वे भय और लालच में आकर पाला बदलने में उस जनता की तनिक भी परवाह नहीं करते जिसने उन्हें यहां तक पहुंचाया है। संविधान निमार्ताओं को जनप्रतिनिधियों के ऐसे आचरण की शायद जानकारी नहीं रही होगी? और जानकारी होती भी तो, संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो ऐसा कानून बनाने की योग्यता रखता हो, जो किसी क्राइम को घटने से रोक सके, किसी क्राइम के लिए दंड तो निर्धारित किया जा सकता है परन्तु ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जा सकता जिससे क्राइम की सोच ही खत्म की जा सके? एक कहावत है कि जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो, खेत की सुरक्षा कैसे हो सकती है? कानून बनाने वाले, उस कानून को लागू करने वाले ही कानून तोड़ने का काम करेंगे तो फिर उसका अंजाम तो वही होगा? समाज में नैतिकता की कद्र करने वाले जब बचेंगे ही नहीं, जब नैतिकता का समाज में मूल्य बचेगा ही नहीं तो नैतिक बनने का लाभ क्या है? जब चुनाव जीतने और हारने का आधार धर्म हो, मंदिर और मस्जिद हों तो देश के मुद्दे तो पीछे छूटते ही जाएंगे, इसमें नया क्या है? कहते हैं कि सिंध के ब्राह्मणवंशी अंतिम हिन्दू सम्राट राजा दाहिर और अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम के बीच 20 जून 712 ई. को सिंधु नदी के तट पर बड़ा भारी युद्ध लड़ा गया। कहते हैं कि वहां एक देवी मंदिर में किसी पुजारी से ही मंदिर का ध्वज झुकवा दिया गया और इस प्रकार राजा दाहिर की सेना ने मान लिया कि अब हम नहीं जीत सकते और वह युद्ध तो हारा ही, अंतिम हिन्दू ब्राह्मण सम्राट राजा दाहिर भी वीरगति को प्राप्त हुए। सवाल न जीत का है न हार का, सवाल तो यह है कि देश की जनता धर्मभीरु होकर देश का क्या भला कर रही है, मात्र कुछ लोगों के बहकावे में आखिर इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों समझने को तैयार नहीं हैं कि धर्म एक व्यक्तिगत आस्था की अवधारणा है और इसका लाभ तभी मिलेगा जब हम अपने आचरण को भी धर्मसम्मत बनाए रखेंगे। धर्म का अर्थ है कि एक नागरिक का राष्ट्र के प्रति क्या कर्तव्य है, एक समाज में रहने वाले लोगों का समाज के प्रति क्या कर्तव्य है, परिवार में रहने वाले सभी परिवारीजन का एक-दूसरे के प्रति क्या कर्तव्य है, एक संत का अपने अनुयायियों के प्रति क्या कर्तव्य है। भाई का बहिन के प्रति, बच्चों का वृद्ध मां-बाप के प्रति, एक नागरिक का दूसरे नागरिक के प्रति जो कर्तव्य है वही तो धर्म है और इसके बिना धर्म का अर्थ ही क्या है? हम सभी का एक धर्म और भी है कि मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम करने से हमारी तरक्की नहीं हो सकती। लोकतंत्र का भी एक धर्म है कि हमें मतदान अपने वास्तविक मुद्दों के आधार पर करना है, हमें भावनाओं में बहना नहीं है, हमारे देश ने इसकी बहुत कीमत चुकाई है। भारतीय समाज को यदि इतिहास में रखकर देखें तो पाएंगे कि कुछ लोगों ने इस देश की ठेकेदारी ली, उन्हीं लोगों ने देश को मझधार में छोड़ने का काम किया। देश का निर्माण वास्तविक रूप से वही करते हैं जो श्रमिक हैं, शिल्पी हैं, अध्यापन के काम से जुड़े हैं। कुछ मुट्ठीभर लोगों के बहकावे में आना कौन सी बुद्धिमत्ता की बात है? जो लोग अपने स्वार्थ के लिए झूठ-पाखंड फैलाते हैं और बाकी के लोग बिना सम्यक विचार किए उनका अनुसरण करते हैं, इससे ही राष्ट्र की सबसे अधिक हानि होती है। राष्ट्र की समृद्धि, देश के सभी वर्गों के लोगों की समृद्धि से जुड़ी है। कुछ लोगों के समृद्ध होने से कोई राष्ट्र समृद्धि के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता। एक लेख का एक अंश यहां उद्धृत किया जा रहा है; ‘ जिनके नवीन धर्म से प्रेरित होकर, समस्त जनपद वासी और राजवर्ग समान रूप से नतमस्तक हो गया था। बड़े-बड़े राजकुमार, सेठिपुत्र, छोटे-बड़े, तरुण अपने संपूर्ण विलास ऐश्वर्य त्यागकर भिक्षु बनते जा रहे थे। व्रात्यों, संकरों और अब्राह्मणों को उनका धर्म बहुत अनुकूल प्रतीत हो रहा था। अब तक ब्राह्मणों का जो धर्म प्रजा पर बलात चिपकाया गया था, उससे जनपद वासियों को संतोष न था। ब्राह्मण धर्म से भीतर ही भीतर द्वेष भावना देश में बहुत फैल गई थी क्योंकि उसमें निम्न श्रेणी के उपजीवियों के विकास का कोई अवसर ही न था। वह राजाओं, ब्राह्मणों और सेठियों का धर्म था। वे ही उस धर्म से लाभान्वित होते थे। वैदिक देवताओं के नाम पर जो बड़े-बड़े खर्चीले यज्ञ किए जाते थे, उनसे राजा-महाराजा बनते तथा महाराज और सम्राट बनते थे, यह उनका लाभ था। पुरोहित मोटी-मोटी दक्षिणा पाकर इन राजाओं को ‘देव’ कहकर पुकारते और भाग्यवाद का ढिंढोरा पीटकर लोगों की स्पर्धा को रोकने का काम करते थे। सर्वसाधारण को उनके इन यज्ञानुष्ठानों के लिए दिग्विजय करने को अपने तरुण पुत्रों के प्राण भेंट करने पड़ते थे, तरुण कुमारी पुत्रियां दासी के रूप में भेंट करनी पड़ती थीं और अपनी मेहनत से कमाई गई सोना-चांदी, अन्न-वस्त्र सब कुछ भेंट करना पड़ता था, जिन्हें राजा अपनी तरफ से ब्राह्मणों को दान कर वाहवाही लूटते थे। इस प्रकार ब्राह्मण धर्म राजतंत्र का ही पोषक धर्म बनकर रह गया था। परंतु बुद्ध ने प्रजातंत्रीय भावना उत्पन्न कर दी थी। ब्राह्मण धर्म में जो ऊंच-नीच का भेद था उसे मिटाने में श्रमण गौतम ने बहुत त्याग और मेहनत की। उन्होंने बड़े-बड़े खर्चीले और आडंबरपूर्ण यज्ञों के स्थान पर आत्मयज्ञ की महत्ता पर जोर दिया। जो जनपद वासी चाहे वह व्रात्य, संकर या अन्य दास और दासियां थे, बुद्ध ने उन सभी का उद्धार किया। अब्राह्मण युवकों को उन्होंने श्रमण परिव्राजक बनाया। उन्हें ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की शिक्षा दी। देश के बड़े बड़े सुकुमार धनी सेठिया युवक जब ऐश्वर्य त्यागकर श्रमण बन गये तो घबराकर ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के अन्य तरीके खोजे।’ हमारे जो भी लोग हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्र के खतरों से अनजान हैं और जिन्हें इन बातों से कुछ फर्क नहीं पड़ता है वह इस बात पर गंभीरता से विचार करें कि संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल करने की तरफ भाजपा बढ़ रही है, उसका असली मकसद मानसून सत्र में संविधान संशोधन लाकर संविधान में संशोधन करना है। यह संशोधन समान नागरिक संहिता के लिए भी हो सकता है, हिन्दू राष्ट्र के लिए भी हो सकता है और डी लिमिटेशन/नारी वंदन अधिनियम के लिए भी हो सकता है। भाजपा ने अपने बारह साल से अधिक के समय में जितने भी विधेयक पारित कराए हैं उन सबमें भारत के एससी, एसटी, ओबीसी व वंचित पीड़ित समाज के लिए कौन सा विधेयक कल्याणकारी था? पूर्व काल में यज्ञों के लिए दान लिया जाता था, अब लोग अपनी इच्छा से ही मंदिरों में दान करते हैं, कुछ ज्यादा बदलाव नहीं है। संवैधानिक प्रावधानों का लाभ चाहे वह अवसर प्राप्त करने का हो, स्वतंत्रता का हो, समानता का हो और चाहे सामाजिक न्याय का हो, बहुजन समाज को इसका लाभ तभी मिलना संभव है जब केंद्र में बहुजन विचारधारा वाली सरकार हो! अर्थात एक ऐसी सरकार जो संविधान के अनुरूप ही सारे विधेयक, कानून बनाए और उनका इंप्लीमेंटेशन सुनिश्चित करे, न कि संविधान में संशोधन करे।
-श्रीपाल सिंह
मो. 7906162116
केंद्र में बहुजन विचारधारा वाली सरकार की जरूरत है!
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