यदि मैं आपसे कहूँ कि दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म स्टूडियो मुंबई या हॉलीवुड में नहीं, बल्कि आपके अपने सिर के भीतर है, तो शायद आप मुस्कुरा दें। लेकिन जरा आज रात आने वाले अपने किसी सपने को याद कीजिए। उस सपने में आपने कितने लोगों को देखा होगा? कितनी सड़कें, मकान, खेत, जंगल, पहाड़, वाहन, आवाजें और घटनाएँ देखी होंगी? क्या आपने कभी सोचा कि यह सब आया कहाँ से? इनमें से अधिकांश पात्रों को आपने पहले कभी उस रूप में नहीं देखा था। फिर भी आपका मस्तिष्क उन्हें पल भर में गढ़ देता है। वह कहानी भी लिखता है, पात्र भी बनाता है, संवाद भी रचता है और पूरा वातावरण भी तैयार कर देता है। सबसे रोचक बात यह है कि उस समय हमें यह एहसास तक नहीं होता कि यह सब हमारे ही मस्तिष्क की रचना है। हम उसे सच मानकर जी रहे होते हैं। यहीं से मेरे मन में एक प्रश्न उठा—यदि मस्तिष्क नींद में इतनी वास्तविक दुनिया बना सकता है, तो क्या भय, तनाव, अंधविश्वास या गहरे विश्वास की स्थिति में वह जागते हुए भी कुछ ऐसी अनुभूतियाँ पैदा नहीं कर सकता जिन्हें हम भूत, प्रेत, जिन्न या देवी का अवतरण समझ बैठें? यही प्रश्न मुझे इस लेख तक ले आया। एक ओर हम चंद्रमा और मंगल तक पहुँचने की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, दूसरी ओर आज भी लाखों लोग भूत-प्रेत, ऊपरी हवा, काला जादू और देवी-देवता के नाम पर ऐसे दरबारों में पहुँचते हैं जहाँ हर सप्ताह ‘समस्या समाधान’ का दावा किया जाता है। ऐसे दरबार केवल दूरदराज के गाँवों तक सीमित नहीं हैं। शहरों में भी सप्ताह के निश्चित दिन भीड़ उमड़ती है। किसी पर देवी आने का दावा होता है, किसी पर भैरव, किसी पर हनुमान जी या किसी अन्य दिव्य शक्ति के अवतरण का। लोग अपनी बीमारी, बेरोजगारी, पारिवारिक विवाद, संतान-सुख, विवाह, व्यापार और यहाँ तक कि कथित भूत-प्रेत की समस्या लेकर पहुँचते हैं। कई स्थानों पर चढ़ावा, दक्षिणा या सेवा शुल्क भी लिया जाता है। धीरे-धीरे यह आस्था का स्थान कम और एक व्यवस्थित व्यवस्था अधिक दिखाई देने लगता है। दिलचस्प बात यह है कि इन कतारों में केवल अशिक्षित लोग नहीं होते, पढ़े-लिखे लोग, इंजीनियर, शिक्षक, व्यापारी और सरकारी कर्मचारी भी उतनी ही श्रद्धा से बैठे मिल जाते हैं। शिक्षा हमेशा वैज्ञानिक सोच की गारंटी नहीं होती, कई बार भय, आशा और भावनाएँ तर्क पर भारी पड़ जाती हैं। अब प्रश्न यह नहीं है कि लोग विश्वास क्यों करते हैं। प्रश्न यह है कि हमारा मस्तिष्क विश्वास कैसे बनाता है। हम अक्सर समझते हैं कि आँखें जो देखती हैं, मस्तिष्क वही स्वीकार कर लेता है। लेकिन आधुनिक न्यूरोसाइंस बताती है कि मस्तिष्क केवल कैमरा नहीं है। वह लगातार वास्तविकता का अर्थ गढ़ता रहता है। उसे जहाँ जानकारी अधूरी मिलती है, वहाँ वह अपने अनुभव, स्मृतियों, कल्पनाओं और डर से खाली जगह भर देता है। यही कारण है कि अँधेरे में टंगा हुआ एक कपड़ा किसी को भूत दिखाई देता है, किसी को कोई आदमी और किसी को केवल कपड़ा। यही कारण है कि कुछ लोगों को अपना नाम पुकारती हुई आवाज सुनाई देती है, जबकि आसपास कोई नहीं होता। यही कारण है कि अत्यधिक तनाव, गहरे शोक, नींद की कमी या कुछ मानसिक अवस्थाओं में व्यक्ति को ऐसी चीजें दिखाई और सुनाई दे सकती हैं जो उसके लिए पूरी तरह वास्तविक होती हैं। ध्यान रहे, अनुभव झूठा नहीं होता। व्यक्ति वास्तव में वही महसूस करता है। लेकिन अनुभव की व्याख्या हमेशा सही हो, यह आवश्यक नहीं है। यही वह जगह है जहाँ विज्ञान और अंधविश्वास अलग हो जाते हैं। विज्ञान कहता है—पहले कारण खोजिए। अंधविश्वास कहता है—पहले निष्कर्ष बना लीजिए। यही कारण है कि यदि किसी को दौरा पड़ता है तो कहीं उसे अस्पताल ले जाया जाता है, तो कहीं झाड़-फूँक शुरू हो जाती है। यदि किसी को मानसिक बीमारी है, तो कहीं मनोचिकित्सक के पास पहुँचाया जाता है, तो कहीं कहा जाता है कि उस पर जिन्न या प्रेत का साया है। इतिहास गवाह है कि जिन बीमारियों को कभी दैवी प्रकोप माना जाता था, उनमें से अनेक का इलाज आज चिकित्सा विज्ञान के पास है। इसलिए हर रहस्यमय घटना को अलौकिक मान लेना ज्ञान का नहीं, जल्दबाजी का परिचय है। आस्था व्यक्ति का निजी अधिकार है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति अलौकिक शक्तियों का दावा करके लोगों की मजबूरी, बीमारी या भय को अपनी आय का साधन बना ले, तब समाज को प्रश्न पूछने ही चाहिएं। यदि किसी के पास वास्तव में ऐसी शक्ति है जो सामान्य मनुष्य के पास नहीं, तो उसकी निष्पक्ष और वैज्ञानिक जाँच से डर कैसा? सत्य को प्रमाण की आवश्यकता होती है, भीड़ की नहीं। मेरा उद्देश्य किसी धर्म, देवी-देवता या आस्था पर प्रश्न उठाना नहीं है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या हम हर ऐसी घटना को बिना जाँच-परख के अलौकिक मान लें? या फिर पहले अपने ही मस्तिष्क को समझने की कोशिश करें—उस मस्तिष्क को, जो हर रात बिना किसी कैमरे, अभिनेता और मंच के हमारे लिए पूरी दुनिया रच देता है। आज आवश्यकता भूतों से लड़ने की नहीं, बल्कि भय, अज्ञान और अंधविश्वास से लड़ने की है। जिस दिन समाज यह समझ जाएगा कि हमारा मस्तिष्क स्वयं कितनी अद्भुत और कभी-कभी भ्रम उत्पन्न करने वाली मशीन है, उस दिन भूत-प्रेत के नाम पर लगने वाले अनेक बाजार अपने-आप सिमटने लगेंगे। हो सकता है कि जिस रहस्य को हम सदियों से ‘भूत’ समझते आए हैं, उसका बड़ा हिस्सा हमारे अपने मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में छिपा हो। और यदि ऐसा है, तो समाधान झाड़-फूँक में नहीं, बल्कि ज्ञान, चिकित्सा, मनोविज्ञान और वैज्ञानिक सोच में मिलेगा।
-रणपाल सिंह, मेरठ
मो. 8218292622
भय, अज्ञान और अंधविश्वास से लड़ने की आवश्यकता है!
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