(मधुगीति 260705 A) 21:05
ये घटाएँ औ छटाएँ,
बादलों की ये विधाएँ;
चींटिंयों की प्रचेष्टाएँ,
चक्षु दर्शित दिशाएँ!
देश कालों सिधाएँ,
पात्र प्रति पल सुधाएँ;
आएँ जाएँ सुहाएँ,
रूप बदले वे विचरें!
रहे जो धरा धाये,
सूर्य शशि जो दिखाए;
समय स्थिति जो झाँके,
बोध बुद्धि के आँके!
रहके अपनी अवस्था,
वे किसी की व्यवस्था;
लख रहे अपने रिश्ते,
सुन रहे जगत् किस्से!
सापेक्ष दृश्य सब हैं,
अम्बर अवनि रचे हैं;
‘मधु’ झाँके प्रभु लटाएँ,
हर ललाटों लताएँ!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
ये घटाएँ औ छटाएँ!
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