बचपन में कई बार ऐसी भ्रांतियां सुनी थी कि रात में या दोपहर में पीपल के पेड़ के पास मत जाना, उस पर भूत और जिन्न का वास होता है, चिपट जायेगा। उस समय मेरे कई हमउम्र साथी भी भूत को देखने का दावा करते थे तो कोई मिर्च मसाला लगाकर बताता था कि आज मैंने पेड़ पर छलावा देखा, उसके पैर उल्टे थे और वह नाक से बात कर रहा था, वगैरा वगैरा। न जाने कितने किस्से कभी न कभी आपने भी सुने अवश्य होंगे, लेकिन बाद में पता चलता है कि इनमें कोई सच्चाई नहीं होती थी, केवल कल्पनाएँ मात्र होती हैं। परन्तु पीपल का तिलिस्म आज भी बरकरार है, लोग जहां भी पीपल का पेड़ देखते हैं उसे पूजने निकल पड़ते हैं। शुरू-शुरू में दीपक जलाते हैं, फिर सरसों का तेल चढ़ाने लगते हैं, कुछ सालों बाद मन्दिर का प्रारूप बना देते हैं। जब इस बारे में लोगों से पूछा जाता है तो लोग बताते हैं कि फलां पंडित ने या फलां मौलवी ने ऐसा करने को कहा है, ऐसा करने से आपकी मनोकामनाएँ पूरी हो जायेंगी। क्या पीपल के पेड़ को पूजने से कोई मनोकामना पूर्ण हो जाती है? पेड़ को पूजना तो ठीक है परन्तु पेड़ से याचना करने से क्या कुछ मिल सकता है? इस पर भी लोग कहते हैं कि पेड़ को पूजना आस्था का विषय है, प्राचीन समय से हमारे पूर्वज पूजते आ रहे हैं, सुनकर-देखकर हम भी पूज रहे हैं। यह सत्य है कि हमारे पूर्वजों ने अवश्य बताया है कि पीपल, बढ़ आदि वृक्ष पूजनीय हैं, वन्दनीय हैं, क्योंकि ये वृक्ष अधिक आॅक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं जोकि सभी के जीवन के लिए जरूरी है। इसलिए इनका संरक्षण करना, इनका अहित मत करना। लेकिन हम मूलभाव से हटकर ही कार्य करने लगते हैं। पेड़ की जड़ में दीपक जलाने लगते हैं। कई बार ऐसा होता है कि उस दीए की लौ से पूरे पेड़ में आग लग जाती है। इसी प्रकार तेल चढ़ाने से पेड़ के तने में एक परत बन जाती है जिससे जमीन से पोषक तत्व पेड़ के ऊपरी भाग तक नहीं पहुंच पाते जिससे पेड़ की डालियां सूख जाती हैं। ऐसे में तो हम उल्टा पेड़ का ही अहित कर रहे है। आस्था के नाम पर इस तरह के अतार्किक कृत्य और भी हैं। हर गांव, हर शहर में आपको मजारें देखने को मिल जाएंगी। मुख्य मार्गों पर, रेलवे स्टेशनों पर, बस अड्डों पर, खेतों में अनेक पीर-मजारें बनी हुई दिख जायेंगी, लोग हर रोज उन्हें भी पूजने आते-जाते रहते हैं। मजार उस संरचना को कहा जाता है जो किसी मुस्लिम व्यक्ति को दफनाने के बाद उसकी कब्र पर बनाई जाती है। समय बीतने के साथ कुछ स्थानों पर ऐसी कब्रें स्थानीय आस्था का केंद्र बन जाती हैं और वहाँ नई धार्मिक परंपराएँ विकसित हो जाती हैं। एक बात हम सब जानते हैं कि जब मुस्लिम समुदाय में किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसे सिर्फ निर्धारित कब्रिस्तान में ही दफनाया जा सकता है, कब्रिस्तान के अलावा कहीं और दफनाया ही नहीं जाता। यहाँ एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि उस व्यक्ति को मुस्लिम आबादी से दूर कैसे दफना दिया गया जहां कब्रिस्तान है ही नहीं? इस पर कुछ लोग कहते हैं कि पहले यहाँ कब्रिस्तान हुआ करता था। चलो मान लेते हैं कि यह पहले समय में कब्रिस्तान था तो अन्य कब्रें भी होनी चाहिएं, उन पर क्यों मजार नहीं बनी हुईं, केवल एक ही मजार क्यों बनी है? बात विचार करने योग्य है! किसी भी आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, किन्तु आस्था और अंधविश्वास के बीच का अंतर समझना भी उतना ही आवश्यक है। यदि कोई परंपरा प्रकृति, समाज या मनुष्य के हित में है तो उसका संरक्षण होना चाहिए। लेकिन यदि किसी परंपरा के पीछे का मूल उद्देश्य भुलाकर केवल बिना सोचे-समझे उसका पालन किया जाए, तो समय-समय पर उसे तर्क, विज्ञान और वर्तमान परिस्थितियों की कसौटी पर परखना भी आवश्यक है। सच्ची श्रद्धा वही है जो विवेक के साथ चलती है। आस्था और तर्क एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और जागरूक समाज के दो आवश्यक आधार हैं।
-रणपाल सिंह, मेरठ
मो. 8218292622
आस्था और अंधविश्वास के बीच का अंतर समझें!
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