(मधुगीति 260816 अ) 11:00
अलवेली हर ही बेल,
ब्रह्म वाटिका रही;
अल्हड़ नवेली उत्स भरी,
जल-जले बही!
हुलसित हृदय से झाँकी,
बाँकी आत्म उर रही;
काया तराशी वो किसी की,
भुवन सिधारी!
हर अंग थे अनंग,
वे-ही भंगिमा दिए;
भुवनेश्वरी के भाव,
वही बिराजे रहे!
था रूप रंग उनका,
हँसी खुशी उन्हीं की;
उद्गार औ आल्ह्वाद,
उदित उन्हीं से हुए!
बेबाक हर ही बात,
उठी लिपटी लुभाई;
‘मधु’ विपिन फली फूली,
शून्य सुधा सुहाई!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा
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