समाज में जब कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से आगे बढ़ता है तो सामान्यत: लोग उसकी सफलता को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि आर्थिक उन्नति व्यक्ति के परिश्रम, संघर्ष और उपलब्धियों का परिणाम होती है। समस्या आर्थिक रूप से समृद्ध होने में नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब आर्थिक उन्नति के साथ व्यक्ति की सामाजिक सोच संकुचित होने लगे और वह उन लोगों से दूरी बनाने लगे जिनके साथ उसने कभी अपने संघर्ष के दिन बिताए थे। अक्सर देखा जाता है कि जैसे-जैसे व्यक्ति आर्थिक उन्नति करता है, वैसे-वैसे उसका सामाजिक दायरा भी बदलने लगता है। वह उन लोगों के साथ उठना-बैठना पसंद करने लगता है, जिनकी आर्थिक स्थिति उसके समान या उससे बेहतर है। दूसरी ओर, कम आय वाले लोगों से उसका मेलजोल धीरे-धीरे कम होने लगता है। वह खुलकर यह नहीं कहता कि अब वह इन लोगों के साथ संबंध नहीं रखना चाहता, लेकिन व्यवहार में दूरी दिखाई देने लगती है। इसके पीछे एक मानसिकता यह भी होती है कि यदि पुराने और आर्थिक रूप से कमजोर लोग उसके संपर्क में बने रहें तो कभी न कभी अपनी आर्थिक समस्या लेकर उसके पास आ सकते हैं। इसलिए व्यक्ति सहायता की संभावित अपेक्षा से बचने के लिए संबंधों को ही सीमित करने लगता है। यह दूरी कई बार इतनी सामान्य तरीके से बनाई जाती है कि सामने वाला व्यक्ति समझ भी नहीं पाता कि आखिर संबंधों में बदलाव क्यों आया। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—क्या आर्थिक उन्नति केवल अपने जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम है, या इससे समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ती है? निश्चित रूप से किसी सम्पन्न व्यक्ति पर हर व्यक्ति की आर्थिक समस्या हल करने की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। हर जरूरतमंद की मदद करना किसी एक व्यक्ति के लिए संभव भी नहीं है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति के पास सामर्थ्य है और उसके सामने अपने ही समाज का कोई जरूरतमंद व्यक्ति खड़ा है, तो उसकी सहायता करना केवल दान नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का एक रूप हो सकता है। दुर्भाग्य यह है कि कई बार आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति मदद करने की क्षमता तो रखता है, लेकिन मदद करने की इच्छा नहीं रखता। वह अपने खर्चों, सुविधाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा पर पर्याप्त धन खर्च कर सकता है, लेकिन किसी आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे की शिक्षा में सहयोग करने, उसकी प्रतिभा को प्रोत्साहित करने या किसी जरूरतमंद परिवार को संकट के समय सहारा देने के लिए आगे नहीं आता। सबसे अधिक विरोधाभास तब दिखाई देता है, जब वही व्यक्ति सार्वजनिक सम्मान और सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेता है। मंच पर सम्मान प्राप्त करना, किसी कार्यक्रम में दिखाई देना, फोटो खिंचवाना या समाज के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराना उसे अच्छा लगता है; लेकिन जहाँ किसी व्यक्ति को वास्तविक सहायता की आवश्यकता होती है और वहाँ किसी प्रचार या प्रशंसा की संभावना नहीं होती, वहाँ उसकी सक्रियता कम दिखाई देती है। विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के संदर्भ में यह बात विचारणीय है। किसी बच्चे में प्रतिभा है, वह पढ़ाई में अच्छा है, खेल में अच्छा है या किसी अन्य क्षेत्र में आगे बढ़ने की क्षमता रखता है, लेकिन उसके परिवार की आर्थिक स्थिति उसके रास्ते में बाधा है। ऐसे बच्चे को यदि समाज का कोई सम्पन्न व्यक्ति थोड़ी आर्थिक सहायता, मार्गदर्शन या प्रोत्साहन दे दे तो उसका पूरा जीवन बदल सकता है। लेकिन अक्सर हम ऐसे बच्चों को पहचानने और आगे बढ़ाने के बजाय केवल उन अवसरों पर सम्मानित करना पसंद करते हैं जहाँ उपलब्धि पहले ही सामने आ चुकी होती है। जिस बच्चे को संघर्ष के समय हाथ पकड़कर आगे बढ़ाया जा सकता था, उसके सफल होने के बाद मंच पर सम्मान करना आसान होता है। यहीं वास्तविक सामाजिक योगदान और सामाजिक दिखावे के बीच अंतर दिखाई देता है। किसी व्यक्ति की आर्थिक सफलता का सम्मान अवश्य होना चाहिए, लेकिन समाज को सफलता की एक दूसरी कसौटी भी विकसित करनी होगी। हमें यह भी देखना चाहिए कि जो व्यक्ति स्वयं आगे बढ़ा, उसने अपने साथ कितने लोगों को आगे बढ़ाया। आर्थिक उन्नति व्यक्ति को दूसरों से श्रेष्ठ नहीं बनाती। अधिक धन होने का अर्थ अधिक ज्ञान होना भी नहीं है। कई बार आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के पास जीवन का ऐसा अनुभव, ज्ञान, प्रतिभा और संघर्षशीलता होती है, जिसकी बराबरी धन नहीं कर सकता। इसलिए किसी व्यक्ति के आर्थिक स्तर को उसके ज्ञान, सम्मान या मानवीय मूल्य का पैमाना बना देना समाज के लिए खतरनाक प्रवृत्ति है। वास्तविक सम्पन्नता केवल बैंक खाते में दिखाई देने वाली राशि नहीं है। यदि आर्थिक उन्नति के बाद व्यक्ति का हृदय छोटा होता जाए, पुराने संबंध बोझ लगने लगें, गरीब व्यक्ति से दूरी बनने लगे और समाज के प्रति जिम्मेदारी कम होती जाए, तो यह उन्नति अधूरी है। इसके विपरीत, यदि व्यक्ति आर्थिक रूप से आगे बढ़ने के बाद यह सोचता है कि ‘मैं जिस रास्ते से ऊपर आया हूँ, उस रास्ते पर मेरे समाज के कुछ और लोग भी आगे बढ़ें’, तो उसकी सफलता का अर्थ कहीं अधिक व्यापक हो जाता है। किसी गरीब बच्चे की फीस भर देना, किसी प्रतिभाशाली विद्यार्थी को किताबें उपलब्ध करा देना, किसी बेरोजगार युवक को सही मार्गदर्शन देना, किसी जरूरतमंद परिवार को संकट में सहारा देना या किसी योग्य व्यक्ति को अवसर उपलब्ध कराना—ये ऐसे कार्य हैं जिनका शायद कोई बड़ा सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं होता, लेकिन इनका प्रभाव बहुत गहरा होता है। समाज को ऐसे ही योगदान की आवश्यकता है। आखिरकार, व्यक्ति की ऊँचाई केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह स्वयं कितनी ऊँचाई तक पहुँचा है, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उसकी ऊँचाई से नीचे खड़े कितने लोगों को ऊपर उठने का अवसर मिला। आर्थिक उन्नति निश्चित रूप से गर्व की बात है, लेकिन यदि उस उन्नति के साथ संवेदनशीलता, विनम्रता और सामाजिक जिम्मेदारी भी बढ़े, तभी वह उन्नति वास्तव में सार्थक कही जा सकती है। धन से व्यक्ति सम्पन्न हो सकता है, लेकिन दूसरों के जीवन में अवसर पैदा करने की क्षमता ही उसे वास्तव में बड़ा बनाती है।
-रणपाल सिंह, मेरठ
मो. 8218292622
आर्थिक उन्नति के बाद क्यों बदलती है सामाजिक सोच?
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