Harikamaldarpan

लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

कितनी रहीं सुरंग!

(मधुगीति 260416 E) 01:33
कितनी रहीं सुरंग,
कितने मन के झरोखे;
आयाम कितने हर तरंग,
आए रहे मेखे!
चोखे कभी लगे जो कितने,
हो गए फीके;
देखे थे कितने दृश्य,
वही हो गए तीखे!
तन्मात्रा बढ़ी घटी,
वृत्ति बदली बहु किईं;
स्फूर्ति कभी आई,
कभी वो गई चली!
हर कुछ कभी था पाया,
चाह कुछ नहीं रही;
था ज्ञान भान प्रचुर,
प्रवृति पर नहीं रही!
आकर के विश्व रंग मंच,
देखा सब किए;
‘मधु’ तब तलक न अपने रहे,
उनके हो गए!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

संबंधित खबरें

Scroll to Top
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x