भारत देश ही नहीं दुनिया में समाज को बदलने में मोबाइल की उपस्थिति से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। अच्छे कपड़े पहनने के साथ-साथ हाथ में मोबाइल होने का वैभव अलग से ही जनसामान्य में देखा जा सकता है। उधर एक दशक से मोबाइल की इंटरनेट पहुंच ने समाज को मनोरंजन, शिक्षा, सूचना और मनचाही जानकारी देने का सबसे सशक्त माध्यम बना दिया है। अब यह स्टेटस सिंबल का भी स्थान ले चला है। नई जनरेशन तो इससे अब सब कुछ सीख रही है जो गलत भी है और सही भी। उससे उसका विश्वास बढ़ा है; वह उसके प्रायोगिक प्रभाव से उपभोक्तावादी व्यवहार में जा चुका है। उसे पास में बैठे; घर में बैठे बड़े-बुजुर्ग लोगों से ज्यादा फिक्र यह रहती है कि मोबाइल मेरे नजदीक है या नहीं; वह उसके रहते आत्मविश्वास से भरा हुआ देखा जा सकता है। व्यावहारिक आपसी जन संवाद मोबाइल की उपस्थिति ने कम किया है। उसकी उपयोगिता को कोई कैसे मना कर सकता है। इधर इसके अतिशय एकाकी प्रयोग से नईं संतानें एक अजीब मनोस्थिति में जाती दिख रही हैं। हम जैसे 60-65 वर्ष की उम्र वाले अपने युवा काल के समय को याद करते हैं तो लगता है कि हमारी संतानें सामाजिक लोक व्यवहार में हमसे कितनी दूर होती जा रही हैं। वह प्रयोग में कितना अपनों से दूर होते हुए दूसरों को अपने लिए उपयोगी समझते हुए; अब उनके नाना प्रकार के सही गलत निर्णय से अपने को नहीं निकाल पा रहे हैं। वह अपने किए को अपने मां-बाप के सामने सही ठहराने लगते हैं। आधुनिक ज्ञान और संस्कार ने पुराने नीति शास्त्र को पूर्णतया फेल कर दिया है। वह बदलाव की दौड़ में अपने को सही साबित करते नजर आ रहे हैं। मुझे इस पर पत्रकारिता जनसंचार का जागरूक अध्येता होने के नाते बहुत अफसोस होता है कि मरने से पहले सुसाइड नोट लिखने का प्रचलन कितना बढ़ा है? वह ठीक समझकर उदाहरण प्रस्तुत किया है और हम ऐसे निर्मित हो रहे समाज में घोर निराशा में चले जाते हैं। आज बड़े-बड़े संस्थानों आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी और कतिपय मेडिकल कॉलेजों के लड़के-लड़कियों के व्यवहार समाज के सामने नए प्रश्न बना रहे हैं जिनका उत्तर खोज पाना मां-बाप, संरक्षकों, सामाजिक संस्थाओं के प्रमुखों के सामने पहेली ही बने हुए हैं। नई संतानों ने अपने मां-बाप को हासिये पर तो किया ही है, वह अपने किए को सही ठहराकर समाज का क्या स्वास्थ्य नहीं खराब कर रहे हैं? हाल ही में मोबाइल, इंटरनेट मीडिया की लत से जुड़े मुकदमे में मेटा और गूगल को भी दोषी करार दिया गया है, इन्हें गलत ठहराया गया है एक अमेरिकी अदालत में। कैली नामक 20 साल की महिला ने लत लगने की दशा में मानसिक बीमारी का जिक्र करके 60000 अमेरिकी डॉलर जुर्माना हासिल किया है। यह मेटा और गूगल समाज का स्वास्थ्य खराब कर चुके हैं। अपने देश में भी आने वाले समय में मोबाइल प्रयोग समाज को एकाकी और मानसिक अवसाद जैसी लाइलाज बीमारियों में ले जाएगा। इसलिए आप सभी विचार करें, इसके जोखिमों से अपने घर परिवार व समाज को बचाएं और समझें कि क्या हम सब मोबाइल युक्त इंटरनेट मीडिया की सार्थकता समझ पाए हैं या नहीं?
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822
घर परिवार में मोबाइल से बिगड़ता सामाजिक स्वास्थ्य!
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