
अभी हाल ही में यशवंत राव होल्कर (तृतीय), पिता रिचर्ड होल्कर को होल्कर राजवंश का 16वाँ उत्तराधिकारी घोषित किया गया है। यह घोषणा न केवल ‘आनन-फानन’ में की गई, बल्कि इसने उन नियमों और परंपराओं को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है जो सदियों से इस राजवंश की मर्यादा रहे हैं। इंदौर की पहचान केवल एक आधुनिक शहर के रूप में नहीं, बल्कि लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर के उन आदर्शों से है, जहाँ ‘राज’ का अर्थ ‘भोग’ नहीं बल्कि ‘सेवा’ था। लेकिन हाल ही में इंदौर के राजवाड़ा स्थित मल्हारी मार्तंड मंदिर में ‘गुपचुप’ तरीके से संपन्न हुआ यशवंत राव होल्कर (तृतीय) का राजतिलक कई ऐसे सवाल छोड़ गया है, जिनका उत्तर मालवा की जनता जानना चाहती है-
1. गोपनीयता के साये में ‘राजतिलक’ क्यों?
होल्कर राजवंश का इतिहास गवाह है कि जब भी कोई नया उत्तराधिकारी चुना जाता था, तो पूरा इंदौर उत्सव मनाता था। ढोल-नगाड़ों की गूँज और जनता की भागीदारी इसकी गरिमा बढ़ाती थी। परंतु इस बार का आयोजन मीडिया और आम जनता की नजरों से बचाकर इतनी ‘सादगी’ और ‘गोपनीयता’ के साथ क्यों किया गया? क्या इस ‘आनन-फानन’ में किए गए निर्णय के पीछे कोई संवैधानिक या पारंपरिक डर छिपा है?
2. नियमों का दोहरा मापदंड : पिता अयोग्य, तो पुत्र कैसे योग्य?
इतिहास के पन्ने पलटें तो हम पाते हैं कि यशवंत राव (तृतीय) के पिता रिचर्ड होल्कर को कभी भी विधिवत उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं किया गया। इसका ठोस कारण राजघराने का वह नियम था, जिसके अनुसार विदेशी मूल की पत्नी की संतान राजगढ़ी या उत्तराधिकार की पात्र नहीं हो सकती। आज सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है : जब पिता को उसी नियम के कारण अयोग्य माना गया, तो आज उनके पुत्र के लिए नियमों की परिभाषा कैसे बदल गई? क्या अब राजवंश की मर्यादाएं केवल व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार बदली जा रही हैं?
3. 1963 का सरकारी दस्तावेज : एक कड़वा सच
भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा 3 मई 1963 को जारी प्रेस नोट (प्रेस सूचना ब्यूरो) इस पूरे मामले को एक नया मोड़ देता है। उस समय राष्ट्रपति ने राजकुमारी उषा राजे को उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता देते समय स्पष्ट किया था कि यह एक ‘असाधारण’ निर्णय है और इसे भविष्य के लिए ‘नजीर’ (मिसाल) नहीं माना जाना चाहिए। सरकार ने साफ कहा था कि यह मान्यता ‘केवल उनके जीवनकाल तक ही सीमित’ रहेगी और भविष्य में उत्तराधिकार के प्रश्न पर विचार करने का अधिकार सरकार के पास सुरक्षित रहेगा। ऐसे में, वर्तमान में की गई यह निजी घोषणा कानूनी और संवैधानिक रूप से कितनी वैध है, यह विचारणीय है।
4. विरासत पर संकट : खासगी ट्रस्ट और बिकती संपत्तियां
सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू ‘खासगी ट्रस्ट’ की संपत्तियों का है। देवी अहिल्याबाई ने इस ट्रस्ट की स्थापना मंदिरों, धर्मशालाओं और जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए की थी। आज यह चर्चा आम है कि ट्रस्ट से जुड़े लोग ही इसकी बेशकीमती संपत्तियों को खुर्द-बुर्द करने या बेचने में लगे हैं। जनता के मन में यह आशंका स्वाभाविक है कि उत्तराधिकार की यह नई ‘घोषणा’ कहीं इन संपत्तियों पर पूर्ण नियंत्रण पाने और उन्हें व्यावसायिक लाभ के लिए उपयोग करने का एक रास्ता तो नहीं है? जो व्यक्ति हमारी संस्कृति, भाषा और स्थानीय जड़ों से दूर रहा हो, वह उस विरासत का मोल कैसे समझेगा जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने त्याग से सींचा था?
5. वास्तविक प्रहरी : उदय राजे होल्कर की अनदेखी
परंपरा केवल रक्त संबंधों से नहीं, बल्कि कर्मों से जीवित रहती है। वर्षों से दशहरे के पावन पर्व पर शस्त्र पूजन और राजवंश की रीतियों का निर्वाह उदय राजे होल्कर पूरी निष्ठा के साथ जनता के बीच कर रहे हैं। समाज उन्हें ही अपना वास्तविक प्रतिनिधि और परंपरा का प्रहरी मानता है। ऐसे कर्मठ व्यक्तित्व को दरकिनार कर, नियमों को ताक पर रखकर किसी और को थोपना इंदौर की सांस्कृतिक पहचान के साथ अन्याय है। विरासतें महलों के पत्थरों से नहीं, बल्कि मर्यादाओं के स्तंभों पर टिकी होती हैं। यदि उत्तराधिकार के नियमों में पारदर्शिता नहीं है और विरासत को केवल ‘प्रॉपर्टी’ समझा जा रहा है, तो यह अहिल्याबाई होल्कर के उच्च आदर्शों का अपमान है। इंदौर की प्रबुद्ध जनता और शासन को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।
-राजेश कुमार पाल, इंदौर
बीमा वाला एवं सामाजिक चिंतक
मो. 9424831940