काश! ये संभव होता, अर्थी अपनी खुद ढोता!
मैं चार कांधे लेता, न ओढ़ कफन चुप सोता!
शव होता सिंहासन पर, सजते फूलों के गमले
शान से जाता काफिला, संग नाचते-गाते अमले
दीवाली, होली जैसा माहौल, न मातम होता!
काश! ये संभव होता, अर्थी अपनी खुद ढोता!
एक जनम का सफर हुआ, क्यों ये रोना-धोना
माँ-बाप, नया तन फिर मिलेगा, प्राण का क्या खोना
कर्मों की खेती जैसी, नर वैसा अन्न संजोता!
काश! ये संभव होता, अर्थी अपनी खुद ढोता!
जीवनभर तड़पाया हमने, रुलाया है लोगों को
रब ने जिम्मेदारी दी थी, गौरव देंगे हम लोकों को
दीपक जैसे हैं तो सही, पर तल में तम ही होता!
काश! ये संभव होता, अर्थी अपनी खुद ढोता!
मुझको मयखाना समझे थे, ये जाने पहचाने लोग
मेरी भावनाएँ मदिरा में, छलकाए दीवाने लोग
इनको भी शीतल शर्बत, मैं देता भर-भर लोटा!
काश! ये संभव होता, अर्थी अपनी खुद ढोता!
मरने से पहले मरघट जा, अपनी चिता सजाता
अंतिम सच सार्थक करने में, थोड़ा समय बिताता
शवदाहक न रखता, खुद ही चिता में चित्त पिरोता!
काश! ये संभव होता, अर्थी अपनी खुद ढोता!
मरे हुए को कफन ओढ़ाते, जीवित को रूमाल नहीं
कर्मकांड में दानी बनते,
बेबस को धेला-माल नहीं
हड़पते घर, धन-संपदा,
तब नैन दो आँसू रोता!
काश! ये संभव होता,
अर्थी अपनी खुद ढोता!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
काश! ये संभव होता!
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