अच्छी थी, पगडंडी अपनी।
सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।
फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।
सबके पास, काम बहुत है।।
नहीं जरूरत, बूढ़ों की अब।
हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।
उजड़ गए, सब बाग बगीचे।
दो गमलों में, शान बहुत है।।
मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं।
कहते हैं, जुकाम बहुत है।।
पीते हैं जब चाय, तब कहीं
कहते हैं, आराम बहुत है।।
बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री।
व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है।।
आदी हैं, एसी के इतने।
कहते बाहर, गर्मी बहुत है।।
झुके-झुके, स्कूली बच्चे।
बस्तों में, सामान बहुत है।।
नहीं बचे, कोई सम्बन्धी।
अकड़, ऐंठ, अहसान बहुत है।।
सुविधाओं का ढेर लगा है।
पर इंसान परेशान बहुत है।।
प्रस्तुति : श्याम शंकर पाल उर्फ सचिन
हरिकमल दर्पण हरियाणा प्रभारी
पाल एकता मंच राष्ट्रीय सचिव
भारतीय जीवन बीमा निगम
सीनियर इंश्योरेंस एडवाइजर
मो. 9891441417, 9999007349
इंसान परेशान बहुत है!
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