(मधुगीति 260327A ) 19:35
मैं कहाँ वो रहा जो था पहले,
कल कहाँ रहूँगा आज जो हूँ;
काल के बदलते प्रवाहों में,
देश के सुलझते प्रवासों में!
कोई पाला था मुझे बालक वत,
कोई सहपाठी रहा साक्षी वत;
संग कोई कार्य किया साथी बन,
कोई कविता सुना समीक्षक बन!
कभी स्नेह किया प्रेमी बन,
कभी बन साथी बिताया जीवन;
कभी दिन रात मन लहर देखीं,
कभी संतति की क्रियाएँ देखीं!
ध्यान में कभी खोके चित निरखा,
समाधि जाके शून्य था झाँका;
लौट संसार का रूप देखा,
स्वरूप सबका फिर लगा चोखा!
विश्व तब कहाँ रहा पहले वत,
प्राण हर अपना लगा उर स्थित;
‘मधु’ तब लागे जैसे गो-पालित,
गोद रह गुरु की ब्रह्म संचालित!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
मैं कहाँ वो रहा जो था पहले!
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