जीवन क्या है..?
जीवन का दूसरा नाम है विश्वास
जब टूटता है विश्वास
टूट जाता है स्वयं इन्सान
और तोड़ता है विश्वास
मन का शक, मन का भ्रम
मनगढंत गलतफहमियां
शक जब सुलगाता है मन
उठता है शक का धुंआ
सोच लिपटी रहती है
इस धुंए में
पनपती है कुंठा
जो पनपाती है अविश्वास….
जब पनपने लगे अविश्वास
मन सोचता है
हर गलत को सही
और सही को गलत
तब… बदलने लगती है सोच
बदली सोच
करती है मन भ्रमित
भ्रमित मन
बदलता चलने की दिशा
और…बदल जाती है परिस्थितियां…
बदलते ही परिस्थितियां
छाने लगते हैं
बादल संकट के
और… इन्हीं मेघों की बरसात
कर देती है जीना दूभर
कुतर्क पर उतर आते हैं
मन और मष्तिष्क
उलट जाते हैं कर्म
जो उलट देते हैं परिणाम…
जीने के लिए
जीतना होता है विश्वास
कहीं किसी ने जीता है
तर्क से विश्वास
मगर…देता है असीम शक्ति
मन का विश्वास
पथ प्रदर्शक बनता है विकास का
ये विश्वास
कुतर्क से सुरक्षा करता है
मन का विश्वास
विपरीत परिस्थितियों में
सहारा बनता है विश्वास
सफलता की कुंजी है विश्वास
विश्वास तो विश्वास है
विश्वास एक
मगर रंग अनेक…!
प्रस्तुति : श्याम शंकर पाल उर्फ सचिन
हरिकमल दर्पण हरियाणा प्रभारी
पाल एकता मंच राष्ट्रीय सचिव
भारतीय जीवन बीमा निगम
सीनियर इंश्योरेंस एडवाइजर
रेजिडेंट वेलफेयर सोसाइटी महासचिव
सागर एनक्लेव गुरुग्राम हरियाणा
मो. 9891441417, 9999007349
विश्वास के रंग!
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